International Relations

अध्याय :-1अंतर्राष्ट्रीय संबंध एवं कुछ महत्त्वपूर्ण संकल्पनाएँ (International Relation & Some Important Concepts)

 'राष्ट्र' शब्द जिसका प्रयोग बहुधा 'राज्य' के स्थान पर भी कर लिया जाता है, यह एक ऐसा शब्द है जिसके सांस्कृतिक निहितार्थ हैं। इसका संबंध जनता के उस समूह से होता है जो एकात्मता एवं आपसी मूल्यों की भावना से संगठित होता है। इसे राजनीति विशेषज्ञ 'कल्पित समुदाय' (Imaginary Community) की संज्ञा देते हैं। यह समूह कुछ सांस्कृतिक कारकों पर आधारित होता है, जैसे- समान इतिहास, समान भाषा, समान धर्म, समान सजातीयता एवं समान प्रथाएँ आदि। 'राज्य' शब्द का संबंध राजनीतिक विचार और कानूनी सत्ता दोनों से होता है। तथापि, संयुक्त रूप से 'राष्ट्र राज्य' शब्द का संबंध 'राष्ट्र' के रूप में एक ऐसी सांस्कृतिक इकाई से होता है, जिसकी सीमाएँ 'राज्य' की राजनीतिक-कानूनी सीमाओं के समान होती हैं। निकोलो मैकियावेली (Niccolo Machiavelli) संभवत: ऐसे पहले राजनीतिक विचारक थे, जिन्होंने अपनी कृति 'द प्रिंस' (The Prince) में आधुनिक राज्य के राजनीतिक सार का वर्णन किया था। अंतर्राष्ट्रीय कानून के अंतर्गत आधुनिक राज्य निम्नलिखित चार लक्षणों पर आधारित होता है: स्थायी जनसंख्या (Permanent Population); निश्चित प्रदेश (Certain Territory); संगठित सरकार (Organised Government) तथा प्रभुसत्ता (Sovereignty)।

अंतर्राष्ट्रीय संबंध (International Relation)

अंतर्राष्ट्रीय संबंध से तात्पर्य दो या अधिक राष्ट्रों के मध्य संबंधों के स्वरूप से है, जिसमें राजनीतिक आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं सामरिक संबंध स्थापित होते हैं। दो या दो से अधिक राष्ट्रों के मध्य संबंधों का निर्धारण अनेक पहलुओं के द्वारा होता है. जिसमें शामिल हैं- राष्ट्र की शासन व्यवस्था, भौगोलिक अवस्थिति, संसाधनों की उपलब्धता, सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक विकासक्रम, विचारधारा एवं ऐतिहासिक मूल्य इत्यादि। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को अंतर्राष्ट्रीय संगठन, वैश्विक व्यापार प्रतिरूप एवं नेतृत्व क्षमता भी प्रभावित करती है। राष्ट्र की सुरक्षा एवं संपन्नता को सुनिश्चित करने के लिये न सिर्फ पड़ोसी देशों के साथ बल्कि अन्य राष्ट्रों के साथ भी सकारात्मक एवं सौहार्द्रपूर्ण संबंध सहायक सिद्ध होते हैं। चूँकि मध्य युग तक राष्ट्र-राज्यों का अस्तित्व ही नहीं था. तकनीकी संभव नहीं थे। चूँकि मध्य युग तक राष्ट्र-राज्यों का अस्तित्व ही नहीं था. तकनीकी दृष्टि से उस समय से पूर्व अंतर्राष्ट्रीय संबंध भी संभव नहीं थे। तथापि, इस बात के स्पष्टीकरण की कोई आवश्यकता नहीं है कि प्राचीन काल में अंतर्राष्ट्रीय मामलों को उजागर करने वाली राजनीतिक गतिविधियाँ प्रत्यक्ष थीं। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में राष्ट्र-राज्य व्यवस्था की अवधारणा के उदय के संकेत 1648 की वेस्टफेलिया की संधि (Westphalia Treaty) से मिलते हैं, जिसने यूरोप में तीस वर्षों (1618-1648) के युद्ध को समाप्त कर दिया। यह संधि राज्य व राज्य-व्यवस्था को कानूनी मान्यता देती थी। वास्तव में इसके द्वारा दो राज्यों - स्विट्जरलैंड और नीदरलैंड का निर्माण हुआ। इसके बाद यूरोपीय शासकों ने रोमन कैथोलिक चर्च की सत्ता को अस्वीकार कर दिया। कालांतर में राष्ट्र राज्य की अवधारणा ने न केवल विभिन्न अर्थ एवं रूप ग्रहण किये हैं बल्कि इसकी सत्ता ने नवीन उपलब्धियों का भी सामना किया है। हाल के वर्षों में व्यापार, उत्पादन और वित्त का वैश्वीकरण: संचार एवं परिवहन के क्षेत्र में क्रांति, तकनीक एवं शस्त्रों के विस्तार तथा पर्यावरणीय एवं सतत् सामरिक संकट ने ऐसी समस्याएँ खड़ी की हैं. जिनका समाधान राष्ट्र राज्यों की संरचना के अंतर्गत नहीं किया जा सकता। यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक संस्थाओं की खोज एवं विस्तार को अनिवार्य बनाता है जो कि राष्ट्रीय संप्रभुता (National Sovereignty) के परंपरागत मूल्य को दुर्बल बना सकता है। त्वरित वैश्वीकरण (Cilobalisation) के सांस्कृतिक प्रभाव अपने साथ उन विघटनकारी तत्त्वों को भी ला रहे हैं, जो समाज को अधोपतन की ओर प्रवृत्त करते हैं और जो पुरानी सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इकाइयों को विखंडित कर सकते हैं। अधोगमन की यह प्रवृत्ति पश्चिम के आर्थिक रूप से उन्नतिशील राष्ट्र राज्यों में अधिक दिखाई देती है तथा इसका उद्देश्य राष्ट्र राज्यों की एक संस्था के रूप में उनकी सत्ता के साथ-साथ उनके महत्त्व एवं औचित्य को भी कम करना प्रतीत होता है।

अंतर्राष्ट्रीय संबंध एवं कुछ महत्त्वपूर्ण संकल्पनाएँ

• पुनर्जागरण (Renaissance) : इसका शाब्दिक अर्थ पुनर्जन्म (Rebirth) होता है। इसे मुख्यतः प्राचीन ग्रीस एवं रोम के उस सांस्कृतिक आंदोलन से जोड़कर देखा जाता है जिसमें शिक्षा एवं कला के क्षेत्र में बहुत सारा विकास देखने को मिला था।

• प्रबोधन या ज्ञानोदय ( Enlightenment): एक बौद्धिक आंदोलन जिसने विवेक बुद्धि, तर्क एवं प्रगति के नाम पर धर्म, राजनीति एवं शिक्षा के क्षेत्र में परंपरागत मान्यताओं को चुनौती दी।

• साम्राज्य (Empire): प्रभुत्व की एक संरचना जिसके अंतर्गत भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक एवं जातीय समूह, राष्ट्रीयताएँ एक ही सत्ता के अधीन कर दी जाती हैं।

• सकारात्मक शांति (Positive Peace): ऐसी शांति जो युद्ध के मूल कारणों को समाप्त करे। यह केवल युद्ध विराम नहीं है बल्कि उन संबंधों का परिवर्तन है जिसमें आर्थिक शोषण एवं राजनीतिक उत्पीड़न खत्म कर दिया जाता है या उसमें कमी लाई जाती है। • सैन्यवाद (Militarism ) : युद्ध, सैन्यबल एवं हिंसा का महिमामंडन ।

• संरचनात्मक हिंसा (Structural Violence): कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला शब्द जो गरीबी, भूख, उत्पीड़न और संघर्ष के सामाजिक एवं आर्थिक स्रोत का संकेत करता है।

• राज्य प्रायोजित आतंकवाद (State Sponsored Terrorism ):- राज्यों द्वारा राजनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये आतंकवादी समूहों का सहारा लेना। सामान्यतया राज्य को इंटेलिजेंस एजेंसियों के नियंत्रण में आतंकवादी समूह कार्य करते हैं।

• युद्ध अपराध (War Crimes ): युद्धबंदियों के साथ दुर्व्यवहार करने या नागरिकों को जरूरत से ज्यादा लक्षित करने जैसे युद्ध नियमों का उल्लंघन करना ।

• अंधराष्ट्रीयता (Chauvinism ): किसी वजह या समूह के प्रति समालोचना एवं तर्क रहित समर्पण जो ज्यादातर इसक सर्वोच्चता में विश्वास के कारण होता है, जैसे- राष्ट्रीय अंधभक्ति।

• हर्जाना (Reparation): ऐसी क्षतिपूर्ति जिसमें वित्तीय भुगतान या वस्तुओं की प्राप्ति शामिल हो सकती है। इस तरह का ज़्यादातर हर्जाना विजयी देशों द्वारा हारे हुए देशों पर दंडस्वरूप लगाया जाता है।

• तुष्टीकरण (Appeasement) : विदेश नीति का एक उपाय जिसके अंतर्गत एक आक्रामक राज्य को इसके राजनीतिक उद्देश्यों में बदलाव लाने और विशेषकर युद्ध को टालने के उद्देश्य से कई तरह की छूट दी जाती हैं।

• प्राकृतिक राज्य ( State of Nature): ऐसा समाज जहाँ किसी प्रकार की राजनीतिक सत्ता न हो या व्यक्ति पर कोई औपचारिक (कानूनी) नियंत्रण न हो।

• जेनोफोबिया (Xenophobia) : अन्य समूहों विशेषकर विदेशियों का भय होना।

• सांस्कृतिक साम्राज्यवाद (Cultural Imperialism): वैश्विक संस्कृति के रूप अमेरिका के बढ़ते प्रभुत्व की आलोचना स्वरूप उपयोग किया जाने वाला शब्द ।

• लोकतांत्रिक शांति (Democratic Peace): व्यावहारिक साक्ष्यों से समर्थित एक मान्यता कि लोकतांत्रिक देश एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध नहीं करते यद्यपि वे सत्तावादी शासन (Authoritarian Rule) के खिलाफ युद्ध करते हैं।

• निर्भरता सिद्धांत (Dependeney Theory): मार्क्सवाद की ओर उन्मुख एक सिद्धांत जो यह बताता है कि देश के अंदर का पूंजीपति वर्ग एवं विदेशी पूंजी के दीच साठगाँठ होने के कारण तृतीय विश्व के देशों में पूंजी का अभाव बना रहता है।

• विकास सहायता समिति (Development Assistance Committee): पश्चिमी यूरोप, उत्तरी अमेरिका तथा जापान की सदस्यता से बनी समिति जो दक्षिण या तीसरे विश्व के देशों को 95 प्रतिशत आधिकारिक विकास सहायता (Official Development Assistance) उपलब्ध कराती है।

• राजनयिक उन्मुक्ति (Diplomatic Immunity): इसका तात्पर्य राजनयिक गतिविधियों को मेजबान देश (Host Country) के राष्ट्रीय न्यायालयों के क्षेत्राधिकार से बाहर रखने से है।

अध्याय 2 विदेश नीति  (foreign policy)

अन्य देशों के साथ संबंधों से संबंधित नीति को किसी देश की विदेश नीति (Foreign Policy) कहा जाता है। सामान्यतः विदेश नीति के अंतर्गत राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रसंगों से जुड़े सभी विषयों, जैसे कि शांति, निरस्त्रीकरण, जलवायु परिवर्तन. विकास, न्याय, भूमंडलीकरण आदि के संदर्भ में देशों के मध्य संबंधों के संचालन को शामिल किया जाता है। अन्य शब्दों में, "यह वैश्विक मामलों में अपने राष्ट्रीय हितों की तलाश में किसी देश की नीति की रूपरेखा होती है।" वस्तुतः एक राष्ट्र राज्य अपनी विदेश नीति के माध्यम से ही अन्य राज्यों के व्यवहार को नियंत्रित करने का प्रयत्न करता है।

2.1 विदेश नीति : अर्थ एवं कार्य-क्षेत्र (Foreign Policy : Meaning and Scope)

जहाँ तक विदेश नीति को सुपरिभाषित करने का प्रश्न है तो विदेश नीति की अपनी पारंपरिक परिभाषा है- "किसी अन्य देश के व्यवहार को बदलने तथा अंतर्राष्ट्रीय परिवेश में अपनी गतिविधियों को समायोजित करने के लिये अपने देश के क्रियाकलापों की व्यवस्था ही हमारी विदेश नीति कहलाती है।"

भारतीय विदेश नीति (India's Foreign Policy)

यह माना जाता है कि किसी देश की विदेश नीति केवल उसके राष्ट्रीय हित (National Interest) से प्रेरित होती है तथा दूसरे देशों के साथ समझौता करने में कोई भी अन्य प्राथमिकता सम्मिलित नहीं होती। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि फिर "राष्ट्रीय हित' का निर्धारण कैसे होता है? इस संदर्भ में दो मत सामने आते हैं- आदर्शवादी मत (Idealistic View). जहाँ 'राष्ट्रीय हित' को कुछ सार्वभौमिक भौतिक आकांक्षाओं, जैसे कि शाश्वत शांति अथवा मानवीय भाई चारे से जोड़कर देखा जाता है; और यथार्थवादी मत ( Realistic View), जिसके अनुसार राष्ट्रीय हित (National Interest) को राष्ट्रीय शक्ति (National Power) के बराबर का दर्जा दिया जाता है। वास्तव में राष्ट्रीय हित (National Interest) ही विदेश नीति की प्रमुख संकल्पना है क्योंकि राष्ट्रीय हित ही किसी राज्य की आकांक्षाओं को परिभाषित करते हैं। इसका राज्य की अन्य नीतियों एवं कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के संदर्भ में भी व्यावहारिक रूप से प्रयोग किया जा सकता है। साथ ही इसका राजनीतिक रूप से भी अनुप्रयोग व्यवहार्य है। यहाँ यह बात महत्त्वपूर्ण है कि आज वैश्वीकरण के दौर में किसी देश के राष्ट्रीय हित को उसकी भू-राजनीतिक अवस्थिति (Geo-Political Location) एवं वैश्विक पर्यावरण (Global Environment) से अलग करना मुश्किल है। कुल मिलाकर किसी देश की विदेश नीति उसके विभिन्न लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये संचालित कार्य-योजनाओं के कुल योग से कहीं अधिक होती है। साथ ही किसी देश की विदेश नीति न केवल घरेलू कारकों बल्कि अंतर्राष्ट्रीय कारकों से भी निर्धारित होती है। इनमें कुछ गतिशील कारक (Dynamic Factors) होते हैं, जो समय के साथ-साथ परिवर्तित होते रहते हैं और कुछ मौलिक कारक (Basic Factors) होते हैं, जो विदेश नीति पर दीर्घकालिक प्रभाव डालते हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि किसी देश की विदेश नीति के कार्यान्वयन हेतु निरंतरता और परिवर्तन दोनों ही आयाम अपना अस्तित्व रखते हैं।

विदेश नीति का महत्त्व (Importance of Foreign Policy)

आज के विश्व में घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय जगत के बीच विद्यमान अंतर निरंतर कम होता जा रहा है। अतः जब हम विदेश नीति के बारे में सोचते हैं तो हमें इसके घरेलू निहितार्थो के विषय में भी अवश्य सोचना चाहिये। किसी भी देश की विदेश नीति का अंतिम प्रयोजन अपने नागरिकों की सुरक्षा के साथ-साथ उनके हित एवं खुशहाली को भी बढ़ावा देना होता है। आज एक ऐसे विश्व की दरकार बनी हुई है, जो सभी को शांति एवं सुरक्षा का ऐसा परिवेश उपलब्ध करा सके, जिसमें सभी विदेशी शोषण से सुरक्षित रहकर और बाहरी अवसरों का लाभ उठाते हुए निरंतर प्रगति कर सकें।

अध्याय 3 भारत एवं उसके पड़ोसी देश (India and it's Neighboring Countries)

वर्तमान में भारत पर अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रमों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। हमारा स्वास्थ्य, हमारी सुरक्षा, हमारी संवृद्धि एवं समृद्धि के साथ-साथ हमारे जीवन की गुणवत्ता भी उत्तरोत्तर इस बात से प्रभावित होती है कि देश की सीमा के पार क्या हो रहा है? यही कारण है कि हम पड़ोस में होने वाली घटनाओं को नजरअंदाज करने का साहस नहीं कर सकते, बेशक ये घटनाएँ कहीं दूर घटती प्रतीत होती हों। दरअसल, आज के विश्व में आपको दूसरों के संबंध में जानकारी रखना लाभकारी ही होगा।

 भारत और चीन (India and China)

सन् 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद यह आशा की जा रही थी कि भारत और चीन के संबंध इतने घनिष्ठ व सुदृढ़ होंगे कि ये दोनों देशों के लिये लाभप्रद स्थितियाँ उत्पन्न करने में सक्षम होंगे। प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों और साम्राज्यवाद के विरुद्ध दोनों के समान हितों का दृष्टिगत रखते हुए दोनों देशों के बीच अंतरंगता की दुहाई भी दी जाती रही। यह भी स्पष्ट था कि दोनों राष्ट्र आर्थिक अभाव से ग्रस्त विकास की जटिल चुनौतियों से जूझने को विवश थे। वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्र में भी सहयोग की संभावनाएँ तलाशी जा सकती थी। ऐसी स्थिति में द्विपक्षीय संबंधों में किसी तनाव या गतिरोध के बड़े आधारों को चिह्नित करना मुश्किल था। दोनों के पारस्परिक संबंधों के पीछे कई कारण निहित थे. उदाहरणार्थ- भारत को जब स्वतंत्रता प्राप्त हुई तब चीन में भयंकर गृहयुद्ध (Civil War) चल रहा था। साम्यवादी उस गृहयुद्ध में विजय की ओर अग्रसर थे तथा दूसरी ओर  भारत में भी अनेक समस्याएँ थीं, जो देश के विभाजन से उत्पन्न हुई थीं। शुरुआती दौर की बात की जाए तो भारत-चीन संबंध केवल औपचारिक स्तर पर थे। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत-चीन संबंध जरूर दृष्टिगत होते थे, अन्यथा दोनों देशों के बीच कोई ठोस संबंध नहीं था। चीन की क्रांति (Chinese Revolution) के पश्चात् इस स्थिति में परिवर्तन आया और दोनों देशों में शीघ्रता से घनिष्ठ एवं मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित होने लगे। एक अक्टूबर, 1949 को साम्यवादी चीन की विधिवत् स्थापना हुई। जिन देशों ने क्रांति के पश्चात् साम्यवादी चीन को मान्यता दी, उनमें भारत भी सम्मिलित था। भारत ने 30 दिसंबर, 1949 को साम्यवादी चीन को मान्यता प्रदान की। भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन के प्रतिनिधित्व का पूरा समर्थन किया। परिणामतः अमेरिका तथा अन्य गैर-साम्यवादी देश अप्रसन्न जरूर हुए, परंतु भारत की यह नीति उसकी विदेश नीति के ठोस सिद्धांतों पर आधारित थी। जिस सरकार को चीन के विशाल जनसमुदाय ने हृदय से स्वीकार किया. उसकी मान्यता देना और संयुक्त राष्ट्र में उसकी सदस्यता का समर्थन करना, भारत का स्वाभाविक और नैतिक कदम था। सन् 1950 में जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council) के उस प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसमें उत्तर कोरिया को दक्षिण कोरिया पर आक्रमण करने के लिये दोषी ठहराया गया था तब अमेरिका ने भारत की सराहना की थी। दूसरी ओर इससे साम्यवादी जगत को निराशा हाथ लगी। परंतु कुछ ही समय पश्चात् जब अमेरिकी नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र की सेनाएँ उत्तर कोरिया में प्रवेश कर गई तथा चीन की ओर बढ़ने लगीं तय भारत ने स्पष्ट शब्दों में अमेरिका की भी आलोचना की। स्पष्ट है कि इन तमाम विकल्पों का चयन करके भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का परिचय दिया।

भारत-चीन संबंधों में पंचशील की भूमिका (Role of Panchsheel in India- China Relations)

भारत, चीन की तिब्बत नीति से प्रसन्न नहीं था, फिर भी वह चीन के साथ अपनी मैत्री को प्रभावित नहीं होने देना चाहता था। साम्यवादी चीन के संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रतिनिधित्व का भारत ने निरंतर समर्थन किया। भारत और चीन के मध्य एक व्यापक समझौते के लिये वार्ता कोरिया युद्ध के पश्चात् आरंभ हुई। इस वार्ता के फलस्वरूप भारत तथा चीन के तिब्बत क्षेत्र के मध्य वाणिज्य तथा अन्य संबंधों के विषय में भारत-चीन संधि पर 29 अप्रैल, 1954 को हस्ताक्षर किये गए। 

अध्याय 4 वैश्वीकरण तथा वैश्विक मुद्दों पर भारत का दृष्टिकोण (Globalisation and India's View on Global Issues)

वैश्वीकरण वस्तुत: एक प्रक्रिया को इंगित करता है जिसमें व्यापार के वैश्विक नेटवर्क (Global Network of Trade), संचार, आव्रजन (Immigration) और परिवहन के माध्यम से अर्थव्यवस्थाओं, समाजों एवं संस्कृतियों का एकीकरण हो गया है। अभी हाल तक वैश्वीकरण को मुख्यतः विश्व के आर्थिक पक्षों व्यापार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, अंतर्राष्ट्रीय पूंजी प्रवाह आदि तक केंद्रित कर देखा जाता था लेकिन अब इसे व्यापक संदर्भों में देखा जा रहा है। इसके अन्तर्गत संस्कृति, मीडिया. तकनीक तथा सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक गतिविधियों और यहाँ तक कि जैविक गतिविधियों, जैसे- जलवायु परिवर्तन संबंधी मुद्दों को भी शामिल किया गया है। आज वैश्वीकरण के प्रभाव से कोई भी देश अछूता नहीं है। किसी-न-किसी रूप में इसका प्रभाव सभी देशों पर दिखाई पड़ता है। भारतीय लोगों के जीवन, संस्कृति, रुचि, फैशन, प्राथमिकता इत्यादि पर भी वैश्वीकरण का व्यापक प्रभाव पड़ा है। एक तरफ इसने आर्थिक विकास की गति और प्रौद्योगिकी का विस्तार कर लोगों के जीवन स्तर को सुधारने में मदद की है तो दूसरी ओर स्थानीय संस्कृति और परंपरा में सेंध लगाकर हम पर विदेशी संस्कृतियों को थोपने का प्रयास किया है। 

भारतीय समाज पर वैश्वीकरण के प्रभाव (Effects of Globalisation on Indian Society)

सामान्य अर्थ में वैश्वीकरण एक आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैश्विक व्यवस्था है, जिसमें बाजारी ताकतें इतनी शक्तिशाली होती हैं कि उनका प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र पर देखा जा सकता है। इस व्यवस्था के अंतर्गत उपभोग तथा उपभोक्तावाद, राष्ट्र तथा राज्य की संप्रभुता का हास, अर्थव्यवस्था का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होना एवं सूचनाओं का बिना किसी समय को बर्बाद किये हुए प्राप्त करना शामिल हैं।

इस वैश्विक ग्राम की अवधारणा से विश्व के लगभग 200 देश तथा 7 अरब जनसंख्या प्रभावित होती है, जिसमें लगभग 60% एशियाई, 13% अफ्रीकी 12% यूरोपियन 10% लैटिन अमेरिकी 6.5% अमेरिका, मैक्सिको, कनाडा तथा शेष 5-6% अन्य हैं।

भारत में उदारीकरण की प्रक्रिया 1990 के दशक के प्रारंभ में शुरू हुई, जिसे आर्थिक सुधार के रूप में जाना जाता है। 1990 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही शीतयुद्ध की समाप्ति हो गई, जिसके कारण राजनीतिक प्रभुत्व के स्थान पर आर्थिक प्रभुत्व की अवधारणा प्रारंभ हुई। जब से यह अवधारणा प्रारंभ हुई, विश्व दो खेमों में विभाजित है; एक जो वैश्वीकरण का समर्थन करता है और दूसरा जो इसे शोषणकारी उपनिवेशवादी मानते हुए इसका विरोध करता है।

वैश्वीकरण में यही प्रक्रिया और विस्तृत रूप में स्वीकारी गई, जिसमें अहस्तक्षेप को मात्र एक देश या अर्थव्यवस्था तक सीमित न रख पूरे विश्व पर लागू किया गया। I

वैश्वीकरण के तीन पक्ष है- पहला, राजनीतिक क्षेत्र जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ नियंत्रित करता है; दूसरा आर्थिक क्षेत्र- जिसे IME WTO विश्व बैंक आदि नियंत्रित करते हैं तथा तीसरा, सामाजिक क्षेत्र जिसे UNICEF जैसी संस्थाएँ नियंत्रित करती हैं।

वैश्वीकरण के विरोधियों में मुख्यतः Raul Prebisch, Gunder Frank तथा Wallerstein जैसे विद्वान है। इनका मत है कि वैश्वीकरण उपनिवेशवाद का नया स्वरूप है, जिसमें पश्चिमी देश अपनी आर्थिक शक्ति एवं तकनीकी कौशल से अल्पविकसित देशों पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहते हैं जिससे उनका प्रमुख इन पर दीर्घकाल तक बना रहे। येअल्पविकसित देशों पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहते हैं, जिससे उनका प्रभुत्व इन पर दीर्घकाल तक बना रहे। ये विद्वान अल्पविकसित देशों को अपना बाजार खोलने के प्रति सचेत करते हैं।

अध्याय 5 संयुक्त राष्ट्र एवं उसके विशिष्ट अभिकरण (United Nations and it's Special Agencies)

संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व का सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय संगठन है। विश्व स्तर पर इस तरह का अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनाने का यह दूसरा प्रयास था। इसके पहले प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद युद्ध एवं हिंसा को रोकने के लिये राष्ट्र संघ (League of Nations) की स्थापना की गई थी लेकिन यह संगठन युद्ध रोकने में सफल नहीं हो सका था। द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका को देखते हुए युद्ध के दौरान ही विश्व के प्रमुख नेताओं ने एक ऐसा संगठन बनाने पर विचार करना शुरू कर दिया था जो भावी पीढ़ी को युद्ध की विभीषिका से बचाए, साथ ही विश्व में शांति भंग करने के प्रयासों को रोक सके। इसे देखते हुए द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद 51 देशों द्वारा 24 अक्टूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई। ये देश अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने, राष्ट्रों के बीच मित्रतापूर्ण संबंध विकसित करने, सामाजिक प्रगति, बेहतर जीवन स्तर की प्राप्ति तथा मानवाधिकारों को प्रोत्साहित करने के प्रति प्रतिबद्ध थे।

संयुक्त राष्ट्र (United Nations)

स्थापना 24 अक्टूबर, 1945

मुख्यालय न्यूयॉर्क सिटी

प्रमुख अंग 6 (संयुक्त राष्ट्र महासभा, सुरक्षा परिषद, आर्थिक एवं सामाजिक परिषद, न्यासी परिषद, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय, सचिवालय)

संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य (Objectives of United Nations)

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 1 के अनुसार इसके प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार है-

• अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखना।

• समान अधिकार और लोगों को आत्म निर्णय सिद्धांत के आधार पर देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों का विकास करना।

• अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, मानवीय समस्याओं के समाधान के लिये सहयोग करना और मानवाधिकारों एवं बुनियादी स्वतंत्रता के प्रति सम्मान को बढ़ावा देना।

• इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये प्रयास कर रहे देशों की गतिविधि में समन्वय स्थापित करने के लिये एक केंद्र के रूप में कार्य करना ।

समय के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ ने इन उद्देश्यों से जुड़े हुए लक्ष्य भी निर्धारित किये हैं, ये हैं निरस्त्रीकरण और नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की स्थापना करना।

संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धांत (Principles of the United Nations)

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद-2 के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रमुख सिद्धांत इस प्रकार हैं-

• यह सभी सदस्य देशों की प्रभुता की समानता पर आधारित है।

• सभी सदस्य देश घोषणापत्र में वर्णित अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करेंगे।

• वे अंतर्राष्ट्रीय शांति, सुरक्षा एवं न्याय को खतरे में डाले बगैर अपने विवादों का अंतर्राष्ट्रीय समाधान खोजने का प्रयास करेंगे।

• सदस्य देश किसी दूसरे देश के विरुद्ध बल का प्रयोग करने अथवा उसको धमकी देने में संयम बरतेंगे।

• संयुक्त राष्ट्र यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसे देश जो कि उसके सदस्य नहीं हैं अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने के लिये उसके सिद्धांतों के अनुरूप ही व्यवहार करें।

अंतराष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय संगठन (International and Regional Organization) 

'अंतर्राष्ट्रीय संगठन' पद का प्रयोग सर्वप्रथम स्कॉटलैंड के प्रमुख विधिवेत्ता जेम्स लारिमर ने किया था। अंतर्राष्ट्रीय संगठन उन संस्थाओं को कहते हैं जिनके सदस्य, कार्यक्षेत्र, प्रकृति, भूमिका एवं विस्तार वैश्विक स्तर पर हो। विभिन्न देशों द्वारा अपनी समस्याओं तथा अन्य वैश्विक विवादों पर साझा विचार-विमर्श के माध्यम से सहमति एवं समाधान प्राप्त करने तथा पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से निष्पक्ष एवं तटस्थ मंच की स्थापना की आवश्यकता ने अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को जन्म दिया। ये संगठन विभिन्न राष्ट्रों की संप्रभुता की रक्षा करते हुए शातिपूर्ण सहअस्तित्व, सहयोग एवं स्पर्द्धा बनाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में कई प्रकार की श्रेणियों के अंतर्राष्ट्रीय संगठन कार्यरत हैं। अंतर्राष्ट्रीय शांति, सुरक्षा एवं सहयोग के लिये संयुक्त राष्ट्र संगठन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

क्षेत्रीय संगठन ऐसे देशों का समूह है जो किसी साझे उद्देश्य की प्राप्ति हेतु रणनीति बनाने एवं कार्य करने के लिये साथ आते हैं। इन उद्देश्यों में मुख्यतः आर्थिक, राजनीतिक, सामरिक एवं सुरक्षा संबंधी हित सम्मिलित होते हैं। क्षेत्रीय संगठन में मुख्यतः किसी एक (समान) भौगोलिक क्षेत्र के देश शामिल होते हैं, किन्तु इसका स्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय भी हो सकता है।

 यूरोपीय संघ (European Union)

"यूरोपीय संघ यूरोप महाद्वीप के 28 देशों का एक विशिष्ट आर्थिक एवं राजनीतिक संघ है, जो संपूर्ण यूरोप के ज्यादातर हिस्सों को समाहित करता है। यूरोपीय संघ का मुख्यालय बेल्जियम के ब्रुसेल्स में स्थित है।

यूरोपीय संघ के 19 देशों द्वारा समान मुद्रा 'यूरो (EURO) प्रयोग की जाती है। यूरो प्रयोगकर्ता देशों को सामूहिक रूप से 'यूरोजोन' के नाम से जाना जाता है। यूरोपीय संघ सामूहिक रूप से विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार 2016 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 22.8 प्रतिशत है। वर्तमान में हम यूरोपीय संघ की जो व्यवस्था देख रहे हैं, उसका विकास द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् यूरोपीय देशों के मध्य हुए विभिन्न समझौतों से हुआ है। यूरोपीय संघ के विकासक्रम को निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है:-

पेरिस संधि (1951)

बेल्जियम, फ्राँस, जर्मनी, इटली लक्ज़मबर्ग एवं नीदरलैंड के मध्य यूरोपीय कोयला एवं इस्पात समुदाय (European Coal and Steel Community- ECSC) के गठन हेतु संधि।

रोम संधि (1957)

इसके माध्यम से निम्नलिखित दो अन्य समुदायों का गठन किया गया- • यूरोपीय आर्थिक समुदाय (Eurojican Economic Community)

यूरोपीय परमाणु ऊर्जा समुदाय (Fluropean Atomic Energy Community) ब्रुसेल्स संधि (1965)

इस संधि को विलय संधि के नाम से भी जाना जाता है। इसके माध्यम से तीनों यूरोपीय समुदायों के अंतर्गत कार्यरत विभिन्न संस्थाओं का विलय कर दिया गया तथा साझी संस्थाओं, जैसे- मंत्रिपरिषद, आयोग, संसद तथा न्यायालय के गठन का प्रावधान किया गया।

एकल यूरोप अधिनियम (1986)

रोम साँध में संशोधन के माध्यम से राजनीतिक एवं आर्थिक एकीकरण।

अध्याय 7 भारतीय सांस्कृतिक कूटनीति एवं प्रवासी भारतीय (Indian Cultural Diplomacy and Indian Diaspora)

कूटनीति का सारतत्त्व वस्तुतः यथार्थवाद एवं आदर्शवाद के मध्य समन्वय स्थापित करना है। स्पष्ट है कि किसी राष्ट्र द्वारा संधियों, समझौतों अथवा गठजोड़ों को सफल बनाने हेतु अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में किये गए प्रयत्न भी कूटनीति के अंतर्गत शामिल किये जाते हैं।

 कूटनीति (Diplomacy)

किसी राष्ट्र की विदेश नीति को व्यावहारिक बनाने वाली नीति ही वस्तुतः कूटनीति कहलाती है, अर्थात् कूटनीति वह राजनीतिक प्रक्रिया है, जिसमें संवादों के माध्यम से दो राष्ट्रों के मध्य पारस्परिक संबंधों की स्थापना एवं उन्हें मधुर बनाने का प्रयत्न किया जाता है

कूटनीति के उद्देश्य (Objectives of Diplomacy)

1. विभिन्न राष्ट्र राज्यों की विदेश नीति में उल्लिखित लक्ष्यों की प्राप्ति का प्रयत्न इस रूप में करना कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन की स्थापना हो सके।

2. अंतर्राष्ट्रीय शांति, सुरक्षा तथा स्थायित्व सुनिश्चित करने का प्रयत्न ।

3. विभिन्न राष्ट्र राज्यों के पारस्परिक हितों की रक्षा तथा उनमें सहयोग व समन्वय के आयामों में अभिवृद्धि करना।

4. कूटनीति के अंतर्गत अब सैन्य संदर्भ भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, अतः इसका एक प्रमुख उद्देश्य अब क्षेत्रीय और वैश्विक सैन्य संतुलन की स्थापना भी माना जाता है।

कूटनीति बनाम राजनीति

राजनीति सत्ता प्राप्ति का एक उपकरण है. जबकि कूटनीति राजनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त करने का एक साधन है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जहाँ राजनीति राष्ट्र की संप्रभुता के संरक्षण को लक्षित करती है, वहाँ कूटनीति के अंतर्गत राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय हितों के बीच सामंजस्य स्थापित करने पर बल दिया जाता है।

5. राजनीतिक उद्देश्य के अंतर्गत कूटनीति का मुख्य लक्ष्य अपने राजनीतिक प्रभाव का विस्तार कर दूसरे राज्यों पर अपनी मांगें थोपना, उनसे रियायतें प्राप्त करना और समझौता वार्ता के दौरान अपनी मनमानी शर्तें थोपना होता है।

6. कूटनीति के मुख्य गैर-राजनीतिक उद्देश्यों में राष्ट्रों के आर्थिक और व्यापारिक हितों की पूर्ति करना होता है।

सामान्यतः कूटनीति से आशय दो (द्विपक्षीय) या दो से अधिक (बहुपक्षीय) राष्ट्र-राज्यों के मध्य की जाने वाली बार्ता श्रृंखलाओं से होता है लेकिन आधुनिक विश्व में गैर-राज्यीय कारकों की भूमिका भी कूटनीति के अंतर्गत बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। इनमें कुछ प्रमुख गैर-राज्यीय कारक (Non State Actors) निम्नलिखित हैं।

• आम नागरिक (Individual Citizen)

• गैर-सरकारी संगठन (Non Governmental Organizations-NGO)

• अंतर्राष्ट्रीय संगठन (International Organizations)

• सिविल सोसाइटी (Civil Society)

• मानवाधिकार संगठन (Human Rights Organizations)

• पर्यावरणीय संगठन (Environmental Organizations)

• बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (Multi National Companies)

• मीडिया (Media)

AKASH BIND

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