Bankon Ka Mayajaal Hindi PDF Book by Ravi Kohad। इस पुस्तक में बैंको के मायाजाल के बारे में वर्णन किया गया हैं। इस पुस्तक का नाम "बैंको का मायाजाल" हैं। इस पुस्तक के लेखक "रवि कोहाड़" हैं। इस पुस्तक को "युवा क्रांति" ने प्रकाशित किया हैं।
मंदी क्या है?
जब बैंक पैसे की कमी कर देते हैं तो बाज़ार में वस्तुओं और सेवाओं की माँग घट जाती है । वस्तुएँ भी होती हैं और लोगों को उनकी ज़रूरत भी होती है , पर पैसे न होने से लोग उन्हें खरीद नहीं पाते । बिक्री ना होने से हर किसी का काम - धन्धा ठप पड़ जाता है । इससे लाखों लोगों की नौकरी चली जाती हैं । पढ़े - लिखे होने पर भी युवाओं को रोज़गार नहीं मिलता । इसमें वे या तो अपने आप को या भगवान को दोषी ठहराने लगते हैं ।
करोड़ों मज़दूरों को भी काम नहीं मिलता , क्योंकि धन्धे में मन्दी की वजह से काम देने वालों के पास भी पैसा कम हो जाता है । पैसों के अभाव में देश में खाना होते हुए भी रोटी तक नसीब नहीं होती । करोड़ों लोग रोज़ भूखे सोते हैं और इससे होने वाले कुपोषण से और बीमारियों से हर रोज़ हजारों बच्चे मर जाते हैं । खाने की मांग में कमी होने से किसान की फसलों , फलों और सब्जियों का कोई मूल्य नहीं रह जाता । एक तरह से पूरी व्यवस्था का चका जाम हो जाता है । मजबूरी में किसान अपनी ज़मीन और उद्योगपति अपना उद्योग सस्ते में बेचने को , 50 हजार की आशा रखने वाला पढ़ा - लिखा युवा 5,000 में , मज़दूर सस्ते से सस्ते मेहनताने पर काम करने को और ओडीसा के कालाहाण्डी में एक माँ 20 रुपए में अपने छोटे से बच्चे को बेचने पर मज़बूर होती है । कुल मिलाकर हर कोई वर्वाद हो जाता है । रॉबर्ट एच . हैम्फिल , फेडरल रिज़र्व बैंक के प्रवन्धक ( 193-1 ) - " हम वाणिज्यिक बैंकों पर पूरी तरह से निर्भर हैं । हममें से किसी न किसी को हर हाल में नकद या क्रेडिट में डॉलर उधार लेने पड़ते हैं । अगर बैंक पर्याप्त मात्रा में पैसे बनाते हैं तो हम समृद्ध हो जाते हैं ; यदि नहीं तो हम भूखे मरते हैं । " फेडरल रिज़र्व बोर्ड के अध्यक्ष , मैरिनर एक्लिस ( 1941 ) - “ अगर हमारी पैसे की व्यवस्था में कर्ज नहीं होगा तो देश में एक भी पैसा नहीं होगा । " क्योंकि पैसा ही कर्ज है और कर्ज ही पैसा है ।
ब्याज कहाँ से आए?
पूरी बैंकिंग व्यवस्था सिर्फ मूल बनाती है ब्याज नहीं । तो , सवाल उठता है कि आखिरकार ब्याज कहाँ , से आए ? इसे समझने के लिए एक उदाहरण देखते हैं : मान लो किसी बैंक ने 100 लोगों को 100-100 रुपए कर्ज़ दिया और मान लो कि सरकार ने भी बैंक से 10,000 रुपए कर्ज लिया । इस तरह कुल कर्ज हुआ 20,000 रुपए ; इस पर 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लगाया गया । अतः एक साल बाद हमें बैंक को 22,000 रुपए लौटाने होंगे । लेकिन बैंक ने कुल 20,000 रुपए ही जारी किए हैं , जिसकी वजह से चलन में कुल 20,000 रुपए ही हैं । इस स्थिति में ब्याज के 2,000 रुपए लौटाना असम्भव है । यह प्रक्रिया कुर्सी के उस खेल की तरह है जिसमें कुर्सी कम होती हैं और खेलने वाले व्यक्ति ज़्यादा । ताली बजने पर सब लोगों को कुर्सी पर बैठना है , परन्तु कुर्सी कम होने के कारण सब लोग उन पर नहीं बैठ पाएँगे , किसी एक को हमेशा खड़े ही रहना है । यह खेल निरन्तर चलता रहता है । कहते हैं प्रेम , युद्ध और कॉम्पीटिशन में हर चीज़ जायज़ है । यह व्यवस्था कॉम्पीटिशन पैदा करती है । इसलिए पूरा समाज पागल होकर , अपना धर्म और कर्तव्य भूलकर एक ही चीज़ में लगा है - अधिक से अधिक धन कमाना ! हर कोई कहता है कि कलयुग आ गया है , लोग लालची हो गए हैं , लोग बुरे हो गए हैं , अब सुधार नहीं हो सकता । कुछ लोग हार मान लेते हैं , परन्तु कुछ समाजसेवी , सन्त - महात्मा यह समझाने में लगे हुए हैं कि संग्रह मत करो ; जो इस व्यवस्था में कभी नहीं हो पाएगा । बहुत लोग इस अभियान में लगे हैं कि अगर पूँजीपति अपना सारा धन गरीबों में बाँट दें , तो गरीबी खत्म हो जाएगी । किन्तु इस व्यवस्था में यह भी असम्भव है । सब लोग अपने वर्ग के शोषण का कारण किसी दूसरे वर्ग को ठहरा देते हैं । व्यापारी , मजदूर , किसान एक - दूसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं कि ये हमें लूट रहे हैं ; पर सच्चाई यह है कि इस व्यवस्था के चक्रव्यूह में हर कोई लुट रहा है और लूटने वाला कोई और ही है , जिसे सत्संग और प्रवचनों द्वारा सही नहीं किया जा सकता ।
बेरोजगारी, भुखमरी और लालच क्यों?
यूरो सिस्टम के निर्माण में सहायक रहे बर्नार्ड लिएटर लिखते हैं “ लालच और प्रतिस्पर्धा अपरिवर्तनीय मानव स्वभाव की वजह से नहीं हैं , बल्कि लालच और कमी का डर लगातार बनाया जाता है ; जो हमारे द्वारा प्रयोग किए जा रहे पैसे ( प्रतीकात्मक मुद्रा ) का एक सीधा परिणाम है । सबको खिलाने के लिए पर्याप्त भोजन की तुलना में हम अधिक उत्पादन कर सकते हैं और दुनिया में हर किसी के लिए पर्याप्त काम निश्चित रूप से है , लेकिन इन सभी को भुगतान करने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है । कमी हमारी राष्ट्रीय मुद्राओं में है । वास्तव में केन्द्रीय बैंकों का काम ही है कि मुद्रा की कमी करे और कमी को बनाए रखे । इसका सीधा परिणाम यह है कि हमें जीवित रहने के लिए एक - दूसरे के साथ लड़ना पडता है । " इस व्यवस्था में जो ईमानदार लोग दूसरों को लूट या मार नहीं सकते , उनके पास इस व्यवस्था से समझौता करना या फिर आत्महत्या करने का ही विकल्प बचता है । इस व्यवस्था में ईमानदारी की कोई जगह नहीं है ।
आत्महत्याएं
बचपन में भविष्य सुरक्षित करने के लिए पढ़ाई के दबाव में , जवानी में नौकरी ना मिलने पर युवक - युवतियों की शादी होने में भी दिक्कतें आती हैं , इस निराशा में हजारों नौजवान आत्महत्या करते हैं ; इस व्यवस्था में सबके लिए जगह नहीं है । बैंकों द्वारा पैदा किए गए ये कृत्रिम अभाव , गरीबी और स्पर्धा लोगों को चोरी , लूट , हत्या , धोखाधड़ी और आत्महत्या करने पर मजबूर करते हैं । हर साल भारत में लगभग 15,000 किसान आत्महत्या करते हैं और पूरे विश्व में हर साल होने वाली कुल 8 लाख आत्महत्याओं में से 1,35,000 ( 17 प्रतिशत ) भारत में होती हैं ।
आत्महत्या या हत्या ?
एक समुदाय में मांस खाने के लिए जानवरों की हत्या करना मना था । मांस खाने के लिए कुछ लोग एक बड़ी सी कढ़ाई में खौलता हुआ तेल डालकर उस पर एक पतला सा फट्टा रख देते थे । बकरी को उस फट्टे पर चढ़ाकर दोनों ओर से रास्ता बन्द कर देते थे । कुछ देर बाद बकरी तेल में कूदकर आत्महत्या कर लेती थी और वे उसे खा लेते थे । यह आत्महत्या है या हत्या ? भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में हम सबको जीने का अधिकार मिला है । यह व्यवस्था मौलिक मानवीय अधिकार का उल्लंघन है । किसानों की आत्महत्या के दोषी बैंक हैं , जिन पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए ।
कर्ज का जाल
ब्याज चुकाने के लिए कर्ज लेना ही पड़ता है और जब भी नया कर्ज लेते हैं , तो उस पर भी और व्याज देना पड़ता है जिसे चुकाने के लिए और अधिक कर्ज लेना पडता है । इस तरह हम कर्ज के जाल में फँस गए हैं । पैसा ही कर्ज है इसलिए इस व्यवस्था में कभी भी कर्ज मुक्त होना असम्भव है । इस व्यवस्था में अगर सारा पैसा वापस भी कर दिया जाए तो भी हम पर कर्ज शेष रहेगा । क्योंकि देश में जितना पैसा है उससे अधिक कर्ज है , जो ब्याज की व्यवस्था के कारण है ।
बंधुआ मजदूरी
अगर 5 सिक्के ( English pennies ) 5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर दिए जाएँ तो 1,850 सालों में 32,36,66,18,157 पृथ्वी जितने बड़े सोने से भरे गोले ब्याज के रुप में देने पड़ेंगे ।
पूरा जीवन हम उस पैसे का ब्याज भरने के लिए काम करते रहते हैं जो बैंकों का है ही नहीं और कभी चुकाया नहीं जा सकता । इस प्रकार यह एक तरह की बन्धुआ मज़दूरी है जो संविधान के अनुच्छेद 23 का उल्लंघन और हमारे मूलभूत अधिकार का हनन है ।
बजट2015-16
सरकार ने टैक्स के रूप में 14,49,490 करोड़ रुपए एकत्रित किए जिसमें से 5,23,958 करोड़ रुपए राज्यों को उनके हिस्से के रूप में दिए । 2,21,733 करोड़ रुपए की सरकार की आमदनी जोड़ने से कुल आय 11,41,575 करोड़ रुपए हो जाती है । इस आय में से सामाजिक सेवाओं ( शिक्षा , स्वास्थ्य , प्रसारण इत्यादि ) और आर्थिक सेवाओं ( कृषि उद्योग , विद्युत , परिवहन , संचार , विज्ञान , प्रोद्योगिकी इत्यादि ) जैसे देश के जनकल्याण के कार्यों में मात्र 58,127 करोड़ रुपए खर्च किए , जबकि 6,81,719 करोड़ रुपया बैंको को सौंप दिए ।
सरकार को टैक्स देना बेवकूफी है।
वर्ष 2015-16 के बजट में 11,41,575 करोड़ की आय में से भारत सरकार ने 4,56,145 करोड़ रुपए ( 40 प्रतिशत ) व्याज चुकाया है और 2,25,574 करोड़ रुपए ( 20 प्रतिशत ) कर्ज चुकाया । अगर सरकार अपने पैसे खुद बनाती तो एक भी रुपया नहीं देना पड़ता । राज्य सरकारों का भी इतना ही पैसा कर्ज का जाता है । टैक्स का 60 प्रतिशत सरकार बैंकों को क्यों सौंप देती है ? हम डीज़ल , पैट्रोल , वैट , आयकर से लेकर प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष रुप से हज़ारों जगह लाखों रुपया टैक्स भरते हैं । क्यों ? क्या हम बेवकूफ हैं ? गधे हैं ?
हर साल 25 लाख करोड़ की लूट
भारत सरकार से बैंको द्वारा लूट= 4,56,145 करोड़
राज्य सरकारों से लूट ( लगभग )= 3 लाख करोड़
जनता से व्याज की लूट ( लगभग )=5 लाख करोड़ रुपए
डॉलर राज द्वारा संसाधनों की लूट ( लगभग )=12.5 लाख करोड़ रुपए
धीरे - धीरे हमारी सारी सम्पत्ति का अधिकांश भाग लूट लिया गया है । 100 रुपए का मतलब था 100 तोला = 1 किलो चाँदी , पर आज हमारे पास 100 / 40,000 x 100 = 0.25 प्रतिशत ही बचा है । 99.75 प्रतिशत धन लुट गया । देश में अगर कुल 20 करोड़ परिवारों में यह पैसा बाँट दिया जाए तो प्रत्येक परिवार को सवा लाख रुपए सालाना मिलेगा । इसलिए अगर बैंकों का बहिष्कार करके हर कोई अपना बैंक खाता बन्द कर दें तो प्रत्येक परिवार को घर बैठे सवा लाख रुपए सालाना मिल सकता है ।
यदि आप सभी पाठकों को इसके अगले भाग(part 3rd)--
1.विश्व नियंत्रण का इतिहास
2.बैंकिंग किंग रोथशिल्ड की कहानी
3.अमेरिका की कहानी
4.आजादी की लड़ाई(1776)
5.अमेरिका के शुरुआती केंद्रीय बैंक
6.द्वितीय केंद्रीय बैंक और राष्ट्रपति जैक्सन पर हमला
7.अब्राहम लिंकन का करिश्मा और हत्या(1863-65)
8.राष्ट्रपति गारफील्ड की हत्या(1881)
9.बड़े खेल की शुरुआत
10.फेडरल रिजर्व एक्ट,1913
को पढ़ना चाहते हैं,तो इस लिंक पर क्लिक करें👉
https://newcurrentarticle.blogspot.com/2021/10/1-2-3-4-1776-5-6-7-1863-658-18819-30.html





