भारत का संविधान और मूल अधिकार ( Indian Constitution and Fundamental Rights ) 1. समानता का अधिकार ( अनुच्छेद 14-18 ) 2. स्वतन्त्रता का अधिकार ( अनुच्छेद 19-22 ) 3. शोषण के विरुद्ध का अधिकार ( अनु . 23-24 ) 4. धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार ( अनु . 25-28 ) 5. संस्कृति तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (अनुच्छेद 29-30) 6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार ( अनुच्छेद 32 )

 

भारत का संविधान और मूल अधिकार 

( Indian Constitution and Fundamental Rights )

 भारत का मूल संविधान कुल 7 मौलिक अधिकार अपने नागरिकों को प्रदान करता था ; किन्तु 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 द्वारा सम्पति के मूल अधिकार को समाप्त कर दिया गया । सम्पत्ति का मूल अधिकार अनुच्छेद 19 ( 1 ) ( च ) तथा अनुच्छेद -31 में वर्णित था । अब सम्पत्ति का अधिकार अनुच्छेद 300 क के तहत् एक विधिक अधिकार है । 

वर्तमान में कुल कितनें मौलिक अधिकार हैं?

वर्तमान में भारतीय नागरिकों को कुल 6 मूल अधिकार प्राप्त हैं। जो अधोलिखित हैं । यथा-

 1. समानता का अधिकार ( अनुच्छेद 14-18 ) 

 2. स्वतन्त्रता का अधिकार ( अनुच्छेद 19-22 ) 

 3. शोषण के विरुद्ध का अधिकार ( अनु . 23-24 ) 

 4. धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार ( अनु . 25-28 ) 

 5. संस्कृति तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (अनुच्छेद 29-30)

 6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार ( अनुच्छेद 32 ) 



1.समानता का अधिकार क्या है?( Right to Equality ) समता का अधिकार किसे कहते हैं? ( अनुच्छेद 14-18 )

 समानता का अधिकार मतलब समता का अधिकार जिस अधिकार नागरिकों के बराबरी या एक ही दृष्टि से कार्य करनें का अधिकार प्राप्त हो,उसे समानता या समता का अधिकार कहा जाता है।

हमारा संविधान भाग -3 , अनुच्छेद ( 14-18 ) समता का अधिकार प्रदान करता है । * अनुच्छेद 14 समता के अधिकार का मूल सिद्धान्त प्रतिपादित करता है तथा अनुच्छेद 15-18 समता के अधिकार के मूल सिद्धान्त के विशिष्ट उदाहरण हैं ।

भारतीय संविधान में कुल कितनें प्रकार की समानताएं प्रदान की गईं हैं?

यदि हम बात करें भारतीय संविधान की तो कुल चार प्रमुख समानाताएं बताई गयी हैं,जो इस प्रकार हैं-
अनुच्छेद -14 भारत में सभी व्यक्तियों को विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण प्रदान करता है । अनुच्छेद -15 राज्य को धर्म ( Religion ) , मूल वंश ( Race ) , जाति ( Caste ) , लिंग ( Sex ) या जन्म स्थान ( Place of Birth ) के आधार पर विभेद करने से रोकता है । अनुच्छेद -16 सर्वजनिक नियोजन ( सरकारी नौकरियों ) में अवसर की समानता के बारे में है । 
अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का तथा अनुच्छेद 18 उपाधियों का उन्मूलन करता है ।

 अनुच्छेद -14 में क्या है? विधि के समक्ष समता क्या है? विधि के समक्ष समता का मतलब क्या है? ( Equality before Law )

अनुच्छेद -14 के अनुसार “ राज्य किसी व्यक्ति को भारतीय राज्य क्षेत्र में विधि के समक्ष समता और विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा । " अनुच्छेद -14 में ' व्यक्ति ' शब्द का प्रयोग किया गया है । अतः अनुच्छेद -14 नागरिकों , अनागरिकों , एवं विधिक व्यक्तियों , यथा- कम्पनी , निगम , व्यक्ति समूह आदि सभी पर लागू होता है । *

 (1) विधि के समक्ष समता क्या है? / विधि के समक्ष समता का अधिकार किस देश के संविधान से लिया गया है? ( Equality Before Law )

विधि के समक्ष समता की अवधारणा ब्रिटेन के संविधान से ली गयी है । यह ब्रिटिश विधिशास्त्री प्रो . डायसी के ' विधि के शासन ' ( Rule of law ) के समरूप है । * यह एक नकारात्मक अवधारणा है । इसका तात्पर्य है समान परिस्थिति वाले व्यक्तियों के साथ विधि द्वारा दिये गये विशेषाधिकारों तथा अधिरोपित कर्तव्यों के मामले में समान व्यवहार किया जायेगा और प्रत्येक व्यक्ति देश की साधारण विधि के अधीन होगा । किन्तु इसका तात्पर्य व्यक्तियों के बीच पूर्ण समानता से नहीं है , क्योंकि यह व्यवहारतः सम्भव नहीं है । राज्य समुचित प्रायोजनों के लिए व्यक्तियों और वस्तुओं का वर्गीकरण कर सकता है । प्रो . डायसी के ' विधि के शासन ' से तात्पर्य है कोई भी व्यक्ति विधि से ऊपर नहीं है । प्रत्येक व्यक्ति , चाहे उसकी अवस्था या पद कुछ भी क्यों न हो , देश की सामान्य विधि के अधीन और साधारण न्यायालयों की अधिकारिता के भीतर होता है ।

  (2) विधियों के समान संरक्षण क्या है? / विधियों के समान संरक्षण का अधिकार कहां से लिया गया है?( Equal Protection of Law's ) 

विधियों के समान संरक्षण की अवधारणा अमेरिकी संविधान के 14 वें संशोधन द्वारा दिये गये अधिकार के समरूप है । यह एक सकारात्मक अवधारणा है । इसका तात्पर्य है - समान परिस्थिति वाले व्यक्तियों को समान विधियों के अधीन रखना तथा उसे समान रूप से लागू करना । अतः राज्य द्वारा जो भी विधियां बनायी जायें उसमें बिना किसी भेद - भाव के सभी को समान संरक्षण देने का उपबन्ध होना चाहिए । • न्यायमूर्ति पतंजलि शास्त्री ने विधियों के समान संरक्षण को विधि के समक्ष समता ' ( Equality before Law ) का ही एक उपसिद्धान्त कहा है । श्री शास्त्री के अनुसार उस स्थिति की कल्पना करना कठिन है जबकि ' विधियों के समान संरक्षण का उल्लंघन होने पर ' विधि के समक्ष समता ' का उल्लंघन न हो । वास्तव में दोनों का एक ही उद्देश्य है— समान न्याय ।

किस केस के द्वारा विधि के शासन को आधारभूत ढांचा घोषित किया गया ?

 • अनुच्छेद -14 में नैसर्गिक न्याय ( Natural Justice ) का सिद्धान्त अन्तर्निहित है । * मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ ( 1980 ) के बाद में अनुच्छेद -14 में निहित ' विधि के शासन ' ( Rule of Law ) को संविधान का आधारभूत ढाँचा घोषित किया गया है । 

• अनुच्छेद -14 वर्ग विभेद का निषेध करता है किन्तु वर्गीकरण की अनुमति देता है अर्थात् यदि एक वर्ग के व्यक्तियों में कोई विभेद नहीं किया गया है तो ऐसी विधि संवैधानिक होगी , अपितु एक वर्ग में विभेद मान्य नहीं है । वर्गीकरण अयुक्तियुक्त और मनमाना ( स्वेच्छाचारी ) नहीं होना चाहिए । ई.पी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य के बाद में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि- " समता और स्वेच्छाचारिता एक दूसरे के कट्टर शत्रु हैं । ' ' * वर्गीकरण युक्तियुक्त होगा , यदि वह -

( 1 ) बोधगम्य अन्तरक ( Intelligible differentia ) पर आधारित हो , तथा 

( 2 ) अन्तरक और अधिनियम के उद्देश्य में तार्किक सम्बन्ध हो । 

अतः वर्गीकरण अधोलिखित आधारों पर किया जा सकता है । यथा -

( i ) भौगोलिक स्थिति के आधार पर 

( i ) राज्य के पक्ष में। 

( iii ) कराधान विधियों के सम्बन्ध में

( iv ) विशेष न्यायालय और प्रक्रिया के सम्बन्ध में

( v ) प्रशासनिक अधिकारियों की विवेकीय शक्ति के सम्बन्ध में

( vi ) ऐतिहासिक आधार पर

( vii ) शिक्षा के आधार पर 

( vii ) व्यक्तियों की प्रकृति के आधार पर , आदि

 • चिरंजीत लाल बनाम भारत संध के मामले में यह धारित किया गया कि एक व्यक्ति स्वयं एक वर्ग माना जा सकता है ( UPPCS - 2005 ) । अतः एक निगम जो कि विधिक व्यक्ति ' की श्रेणी में आता है , उसे भी विधि के समक्ष समता का अधिकार उपलब्ध होगा ।• समता का अधिकार अत्यान्तिक नहीं है । निम्नलिखित मूलाधिकार इसके अपवाद हैं

 1. अनुच्छेद 15 ( 3 ) के अनुसार , राज्य स्त्रियों और बच्चों के लिए विशेष उपबन्ध कर सकता है । 

2. अनुच्छेद 15 ( 4 ) सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ों , अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान करने की छूट राज्य को देता है । 

3. अनुच्छेद 16 ( 4 ) सार्वजनिक नियोजन में विशेष प्रावधान की छूट राज्य को देता है । इसी प्रकार राष्ट्रपति , राज्यपाल , विदेशी राजनयिकों , उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों तथा संसद एवं विधान मण्डल के सदस्यों को प्रदत्त विशेषाधिकार समता के अधिकार का अपवाद हैं।

 धर्म आदि के आधार पर विभेद का प्रतिषेध ( Prohibition of Discrimination on Grounds of Religion etc. ) 

अनुच्छेद -14 में प्रतिपादित समता के अधिकार को अनुच्छेद 15 में और अधिक स्पष्ट किया गया है । अनुच्छेद -15 में कुल पाँच उपखण्ड हैं । अनुच्छेद 15 ( 1 ) तथा 15 ( 2 ) मूलाधिकार हैं । अनुच्छेद 15 ( 3 ) 15 ( 4 ) तथा 15 ( 5 ) राज्य की शक्ति के बारे में हैं । अनुच्छेद -15 द्वारा प्रदत्त मूलाधिकार केवल नागरिकों के लिए है ।

 • अनुच्छेद 15 ( 1 ) केवल धर्म , मूल वंश , जाति , लिंग , जन्म स्थान अथवा इनमें से किसी आधार पर नागरिकों के मध्य विभेद करने से राज्य को रोकता है । विभेद से तात्पर्य है किसी व्यक्ति के साथ दूसरों की तुलना में प्रतिकूल व्यवहार करना । यह अधिकार सिर्फ नागरिकों को प्राप्त है । अतः अन्य व्यक्तियों के साथ विभेद किया जा सकता है । इस अनुच्छेद में प्रयुक्त ' केवल ' शब्द ध्यातव्य है ; इसका तात्पर्य है कि विभेद मात्र धर्म , मूलवंश , जाति लिंग , जन्म स्थान इनमें से एक से अधिक आधारों पर निषिद्ध है किन्तु इनके अतिरिक्त अन्य आधारों पर नहीं । जैसे भाषा या ' निवास स्थान के आधार पर विभेद किया जा सकता है । "

 • अनुच्छेद 15 ( 2 ) , अनुच्छेद 15 ( 1 ) को और एक कदम आगे बढ़ाता है । यह राज्य तथा व्यक्ति दोनों को भेदभाव करने से निवारित करता है । इस रूप में यह अनुच्छेद 15 ( 1 ) से व्यापक है इसका प्रमुख उद्देश्य हिन्दू समाज में व्याप्त छुआ छूत ' जैसी सामाजिक बुराई का अन्त करना है । अनुच्छेद 15 ( 2 ) के अनुसार कोई भी नागरिक केवल धर्म , मूल वंश , जाति , लिंग , जन्म स्थान या इसमें से किसी आधार पर निम्नलिखित में प्रवेश या उसका उपयोग करने के लिए किसी शर्त या प्रतिबन्ध के अधीन नहीं होगा । यथा ( 1 ) दुकानों , सार्वजनिक भोजनालयों , होटलों , सार्वजनिक मनोरंजन के स्थलों , तथा ( ii ) राज्य निधि से पोषित या सार्वजनिक उपयोग हेतु समर्पित- कुओं , तालाबों , स्नानाघाट , सड़क या सार्वजनिक समागम के स्थलों आदि ।• अनुच्छेद 15 ( 3 ) , ( 4 ) तथा ( 5 ) , अनुच्छेद 15 ( 1 ) तथा ( 2 ) के सामान्य नियम का अपवाद हैं । ये राज्य को संरक्षणात्मक भेदभाव की अनुमति देते हैं । 

• अनुच्छेद 15 ( 3 ) राज्य को स्त्रियों और बालकों के लिए उनकी विशेष स्थिति के आधार पर कुछ विशेष प्रावधान करने की शक्ति प्रदान करता है । इस शक्ति के प्रयोग में राज्य द्वारा कई कदम उठाये गये हैं , यथा — बच्चों के लिए शिक्षा का प्रबन्ध , उनके विकास के लिए संस्थाओं की स्थापना , महिला कल्याण के लिए विशेष कार्यक्रम , महिला आयोग की स्थापना , स्त्रियों को विशेष प्रसूति अवकाश ( Maternity Relief ) आदि । ध्यातव्य है कि डी.पॉलराज बनाम भारत संघ के नवीनतम् वाद में अनुच्छेद 15 ( 3 ) के आधार पर ' महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम -2005 , को संविधिक घोषित किया गया है । *

 • अनुच्छेद -15 ( 4 ) को प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम -1951 द्वारा संविधान में अन्तः स्थापित किया गया है । यह संशोधन मद्रास राज्य बनाम चम्पाकम दोरइराजन के मामले में न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के प्रभाव को समाप्त करने के लिए किया गया था । इसके द्वारा राज्य को निम्न के सम्बन्ध में विशेश उपबंध करने की शक्ति प्रदान की गयी है . । सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के लिए , 2. अनुसूचित जाति के लिए , तथा 3. अनुसूचित जनजाति के लिए । ध्यातव्य है कि शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण का प्रावधान अनुच्छेद 15 ( 4 ) के तहत् ही किया गया है । 

• अनुच्छेद -15 ( 5 ) , 93 वें संविधान संशोधन अधिनियम 2005 द्वारा जोड़ा गया है । " इसे मण्डल -2 कहा गया । इसके द्वारा प्राइवेट शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के सम्बन्ध में राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों , अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के सम्बन्ध में , विशेष उपबन्ध करने की शक्ति प्रदान की गयी है किन्तु अनुच्छेद- 30 ( 1 ) में निर्दिष्ट अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान इस प्रावधान के दायरे में नहीं आयेंगे । ध्यातव्य है कि पी.ए , इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की 7 सदस्यीय पीठ ने यह स्पष्ट किया था , कि राज्य अपनी आरक्षण नीति अल्पसंख्यक संस्थानों तथा निजी शैक्षणिक संस्थानों में नहीं लागू करा सकता है । इस प्रकार इस संशोधन द्वारा उक्त निर्णय के प्रभाव को समाप्त करते हुए अनुच्छेद 15 ( 5 ) के माध्यम से निजी शिक्षण संस्थाओं में छात्रों के प्रवेश के लिए स्थानों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है । अशोक ठाकुर बनाम भारत संघ के मामले में पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से केन्द्रीय शिक्षण संस्थान ( प्रवेश में आरक्षण ) अधिनियम -2005 तथा 93 वें संविधान संशोधन अधिनियम को संवैधानिक घोषित किया है । 

अवसर की समानता का अधिकार क्या है? / किन-किन क्षेत्रों में अवसर की समानता की बात की गई है? ( Equality of opportunity ) 

अनुच्छेद -16 , लोक नियोजन में अवसर की समानता की प्रत्याभूति प्रदान करता है । अनुच्छेद -16 ( 1 ) तथा ( 2 ) में अवसर की समानता के सामान्य सिद्धान्त का उल्लेख किया गया है । " अनुच्छेद -16 ( 3 ) , ( 4 ) तथा ( 5 ) उसके अपवाद हैं अनुच्छेद- 16 ( 1 ) तथा ( 2 ) के अनुसार --- • राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन अथवा नियुक्ति के सम्बन्ध में सभी नागरिकों को समान अवसर प्राप्त होंगे [अनुच्छेद-16(1)] 

● विषय में केवल धर्म , मूल वंश , जाति , लिंग , जन्मस्थान, उद्भव एवं निवास के आधार पर नागरिकों के मध्य कोई भेद - भाव नहीं किया जायेगा । [अनुच्छेद -16 ( 2 )] 

 अनुच्छेद 16 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार सिर्फ नागरिकों के मुक्ति ( समाप्ति ) नहीं है । राज्य आवश्यक अहर्ताओं एवं मापदण्डों को निर्धारित कर सकती है । निर्धारित अहर्ताओं में मानसिक योग्यता , शारीरिक दक्षता , अनुशासन , नैतिक स्तर या जनहित आदि रखा जा सकता है । अर्हता पद की प्रकृति के अनुसार होना चाहिए और मनमाना नहीं होना चाहिए । अनुच्छेद -16 ( 1 ) केवल प्रारम्भिक नियुक्ति के मामले में ही नहीं , बल्कि पदोन्नति , पदच्युति , वेतन , अवकाश , ग्रेच्युटि , पेंशन आदि में भी लागू होता है ( UPPCS - 1994 ) । अनुच्छेद -16 , अनुच्छेद 15 से व्यापक है , क्योंकि यह दो अन्य आधारों ' उद्भव ' एवं निवास के आधार पर भी विभेद का निषेध करता है ।

 • अनुच्छेद 16 ( 3 ) , अनुच्छेद 16 ( 2 ) का अपवाद है । यह संसद को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह विधि द्वारा किसी राज्य की कुछ सरकारी सेवाओं में नियुक्ति के लिए उस राज्य में निवास की अर्हता ' विहित कर दें । इस शक्ति के प्रयोग में संसद ने लोक नियोजन ( निवास सम्बन्धी अपेक्षायें ) अधिनियम -1957 पारित किया । इसके द्वारा किसी राज्य या संघ राज्य क्षेत्र में निवास सम्बन्धी अपेक्षा विहित करने वाली सभी विधियों को निरसित ( समाप्त ) कर दिया गया तथा यह प्रावधान किया गया कि किसी व्यक्ति को इस आधार पर निर्योग्य नहीं माना जायेगा कि वह किसी राज्य विशेष का निवासी नहीं है । किन्तु यह अधिनियम निम्न राज्यों पर उनके पिछड़ेपन के कारण लागू नहीं किया गया । यथा- हिमांचल प्रदेश , मणिपुर , त्रिपुरा तथा आन्ध प्रदेश का तेलांगाना क्षेत्र । तेलंगाना क्षेत्र के सम्बन्ध में इस अधिनियम को न्यायालय ने नरसिंह राव बनाम आन्ध प्रदेश के बाद में असंवैधानिक घोषित कर दिया , क्योंकि यह पूरे राज्य ( आन्ध्र प्रदेश ) में लागू नहीं था ।

 • अनुच्छेद 16 ( 4 ) , अनुच्छेद 16 ( 1 ) तथा ( 2 ) का दूसरा अपवाद है । इसमें पिछड़े वर्गों को आरक्षण का प्रावधान किया गया है । इसके अन्तर्गत राज्य जाति के आधार पर विभेद कर सकती है । अनुच्छेद 16 ( 4 ) के अनुसार " इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए वर्ग के किसी नागरिकों के पक्ष में जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है , नियुक्ति या पदों के आरक्षण के लिये उपबन्ध करने से निवारित नहीं करेगी । " इस प्रकार अनु . 16 ( 4 ) के तहत राज्य ऐसे पिछड़े वर्गों के लिए जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की सेवाओं में पर्याप्त नहीं है , आरक्षण का प्रावधान कर सकती है । 

अनुच्छेद -340 के अन्तर्गत राष्ट्रपति पिछड़ा वर्ग आयोग ' की नियुक्ति करता है तथा उसकी रिपोर्ट के आधार पर सरकार पिछड़े वर्गों को विनिर्दिष्ट करती है बालाजी के मामले में केवल जाति को पिछड़ेपन के निर्धारण का आधार मानने से इन्कार कर दिया गया था किन्तु 1978 में गठित मण्डल आयोग के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि पिछड़े वर्ग का निर्धारण जाति के आधार पर किया जा सकता है । * जाति भी एक सामाजिक वर्ग है । यदि वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा है तो वह अनुच्छेद 16 ( 4 ) के प्रयोजनों हेतु पिछड़ा वर्ग होगा । परन्तु सिर्फ आर्थिक आधार पिछड़ा वर्ग निर्धारण की कसौटी नहीं हो सकती है । * 

• मण्डल आयोग का मामला ( इन्द्रासाहनी बनाम भारत संघ ) अनुच्छेद -16 ( 4 ) पर एक प्रमुख वाद है । * इस मामले में पिछड़े वर्गों के आरक्षण के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण निर्णय दिया गया था । मुख्य न्यायाधीश एच.एम. कानिया की अध्यक्षता वाली 9 सदस्यीय पीठ ने 6 : 3 के बहुमत से अपना निर्णय दिया था जिसके अनुसार पिछड़े वर्गों को दिया गया 27 % आरक्षण वैध है , किन्तु पिछड़ों में सम्पन्न वर्ग ( Creamy layer ) को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए । न्यायालय के अनुसार प्रोन्नति में आरक्षण अवैध होगा तथा कुल आरक्षण 50 % से अधिक नहीं होगा । अनु . 16(4) के तहत पिछडे़ वर्ग को “पिछड़ा वर्ग तथा अधिक पिछड़ा वर्ग” में विभाजित किया जा सकता है।

 • अनुच्छेद 16 ( 4 क ) , 77 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1995 द्वारा जोड़ा गया है । इसमें राज्य को यह शक्ति दी गयी है कि वह अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए प्रोन्नति ( Promotion ) में आरक्षण की व्यवस्था कर सकता है यदि उसकी राय में राज्य के अधीन की सेवाओं में इन वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधत्व नहीं है यह संशोधन इन्द्रासाहनी के प्रकरण में न्यायालय के निर्णय के प्रभाव को समाप्त करने के लिए किया गया था ।

 • अनुच्छेद 16 ( 4 ख ) , 81 वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में जोड़ा गया है । इसके द्वारा सेवाओं के आरक्षण में अग्रनयन के नियम ( Carry forward rule ) को मान्यता प्रदान किया गया है । इसके अनुसार यदि किसी वर्ष आरक्षित स्थानों में से कुछ स्थान भरे नहीं जा सके हों तो ऐसे बकाया  (Backlog )आरक्षित स्थानों को एक अलग वर्ग माना जायेगा तथा उसे आगे के वर्षों में एक अलग श्रेणी के रूप में भरा जा सकता है और इसे 50 % आरक्षण की अधिकतम सीमा का उल्लंघन नहीं माना जायेगा चाहे भले ही वह 50 % की सीमा से बढ़ जाय ।

• अनुच्छेद -16 ( 5 ) , यह धर्म के आधार पर विभेद की राज्य को अनुमति देता है इसके अनुसार राज्य द्वारा निर्मित कोई ऐसी विधि जो किसी धार्मिक या साम्प्रदायिक संस्था के किसी पदाधिकारी या सदस्य के रूप में किसी विशिष्ट धर्म या सम्प्रदाय के लोगों को ही नियुक्त किये जाने का प्रावधान करती है , प्रवर्तनीय होगी ।

अस्पृश्यता का अन्त ( Abolition of Untouchability)

अनुच्छेद -17 , समता के अधिकार का एक विशिष्ट उदाहरण है । इसके द्वारा आचरण तथा व्यवहार में समानता का प्रावधान किया गया है यह संविधान में सामाजिक समानता को अन्तर्विष्ट करता है । इसके द्वारा अस्पृश्यता को पूर्णतः समाप्त करते हुए उसका किसी भी रूप में किया जाने वाला आचरण निषिद्ध किया गया , तथा उससे उत्पन्न किसी अयोग्यता को लागू करना दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है । यह एक निरपेक्ष अधिकार है । अनुच्छेद -35 संसद को अस्पृश्यता के सम्बन्ध में विधि बनाने की शक्ति प्रदान करता है । संसद द्वारा इस शक्ति के प्रयोग में ' अस्पृश्यता अपराध अधिनियम -1955 ' पारित कर अस्पृश्यता के अपराध के लिए 500 रु  जुर्माना या 6 माह के कारावास या दोनों के दण्ड का प्रावधान किया गया है । 1976 ई . में इसमें संशोधन कर इसका नाम- सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 कर दिया गया , जो इसी रूप में प्रवृत्त है । ध्यातव्य है कि अनुच्छेद -17 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार केवल राज्य के विरुद्ध ही नहीं वरन् प्राइवेट व्याक्तियों के विरुद्ध भी उपलब्ध है ।

उपाधियों का अन्त ( Abolition of Titels ) 

अनुच्छेद -18 द्वारा राज्य को उपाधियाँ प्रदान करने तथा नागरिकों और अनागरिकों को उपाधियाँ ग्रहण करने से प्रतिषिद्ध किया गया है । अनुच्छेद -18 ( 1 ) के अनुसार राज्या , सेना ( Military ) तथा विद्या ( Academic ) सम्बन्धी सम्मान के शिवाय और कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा । खण्ड ( 2 ) के अनुसार - कोई भारतीय नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि ग्रहण नहीं करेगा । खण्ड ( 3 ) ऐसे विदेशी व्यक्ति जो भारत में कोई लाभ या विश्वास का पद धारण करता है , के बारे में है । ऐसा व्यक्ति किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि राष्ट्रपति की सहमति से ही ग्रहण करेगा अन्यथा नहीं । अनु . 18 ( 4 ) किसी विदेशी राज्य से मिलने वाले किसी भेंट ( Present ) उपलब्धि ( emolument ) या पद ( office ) के बारे में है इसके अनुसार ऐसा कोई भी व्यक्ति जो भारत में किसी लाभ या विश्वास के पद पर है किसी विदेशी राज्य से कोई भेंट , उपलब्धि या पद राष्ट्रपति की अनुमति के बिना ग्रहण नहीं करेगा । उल्लेखनीय है कि अनु . 18 सिर्फ निर्देशात्मक है , आदेशात्मक नहीं । अतः इसका उल्लंघन दण्डनीय नहीं है , यद्यपि संसद दण्ड का प्रावधान कर सकती है ज्ञातव्य है कि 1954 में यह विवाद उत्पन्न हुआ जब भारत सरकार ने विभिन्न सम्मान एवं उपाधियां देना प्रारम्भ किया । • बालाजी राघवन बनाम भारत संघ ( 1996 ) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा धारित किया गया कि भारत रत्न , पद्म विभूषण और पद्मश्री अलंकरण अनु . 18 ( 1 ) में प्रयुक्त ' उपाधि ' शब्द के अन्तर्गत नहीं आते हैं , क्योंकि यह उपाधि नहीं सम्मान हैं और इनका प्रयोग अलंकृत व्यक्ति के नाम के आगे या पीछे नहीं किया जा सकता है ।

कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न

•किस वाद में कहा गया है कि समता और स्वेच्छाचारिता एक दूसरे के कट्टर शत्रु है ? -ई.पी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य 

• किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि दो से अधिक संतान वाले लोगों को पंच या सरपंच पद के लिए अयोग्य घोषित करने वाली विधि विधि के समक्ष समता ' ( अनुच्छेद -14 ) के अधिकार का उल्लंघन नहीं करती है और एक विधि मान्य विधि - जावेद बनाम हरियाणा राज्य 

• अनुच्छेद 15 ( 1 ) किन आधारों पर राज्य द्वारा नागरिकों के मध्य विभेद करने का निषेध करता है ? - केवल धर्म , मूल वंश , जाति , लिंग , जन्मस्थान या इनमें से किसी आधार पर । 

•अनुच्छेद 15 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार किनको प्राप्त है ? *- केवल नागरिकों को । 

• अनुच्छेद 15 ( 1 ) किसको नागरिकों के मध्य विभेद करने से रोकता है ? - राज्य को 

• किसी होटल , दुकान , सार्वजनिक भोजनालय या सार्वजनिक मनोरंजन के स्थलों में नागरिकों को बिना भेदभाव के प्रवेश का अधिकार किस अनुच्छेद द्वारा प्रदान किया गया है ? - अनुच्छेद -15 ( 2 ) द्वारा ।

• किस अनुच्छेद द्वारा नागरिकों को सरकारी या सार्वजनिक उपयोग हेतु समर्पित कुओं , तालाबों , सड़क , स्नानघाट आदि के उपयोग का भेदभाव रहित अधिकार प्रदान किया गया है ? -अनुच्छेद 15 ( 2 ) 

• समाज के कमजोर वर्गों के संरक्षण के लिए प्रावधान किस अनुच्छेद में दिया गया है?- अनुच्छेद 1 5 में

 • किस अनुच्छेद के तहत राज्य को यह शक्ति प्रदान की गयी है कि वह स्त्रियों और बालकों के सम्बन्ध में विशेष प्रावधान कर सकता है ? - अनु . - 15 ( 3 ) के तहत्

• किस वाद में महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम 2005 को संवैधानिक घोषित किया गया ? - डी.पालराज बनाम भारत संघ के वाद में 

• किस अनुच्छेद के तहत् राज्य को सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान करने की शक्ति दी गयी है ? - अनुच्छेद 15 ( 4 ) के तहत् । 

• मद्रास राज्य बनाम चम्पाकम दोरइराजन के मामले में दिये गये निर्णय के पश्चात कौन सा मूल अधिकार संशोधित किया गया ? - भेद - भाव के विरुद्ध अधिकार ( अनु . 15 )

• किस अनुच्छेद के तहत राज्य को सरकारी नौकरियों में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को वरीयता देने की शक्ति प्राप्त है ?-अनु . 15 ( 3 ) के तहत । 

अनुच्छेद 15 ( 4 ) संविधान में कब जोड़ा गया ? - 1951 में , प्रथम संविधान संशोधन द्वारा ।

 • किस वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के पश्चात संविधान में अनुच्छेद 15 ( 4 ) जोड़ा गया ? - मद्रास राज्य बनाम चम्पाकम दोरइराजन । 

• शिक्षण संस्थाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन जातियों का आरक्षण किस अनु . द्वारा शासित होता है ? -अनु . 15 ( 4 ) द्वारा । 

• अनुच्छेद 15 ( 5 ) को संविधान में किस संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया है ? -93 वें संविधान संशोधन अधिनियम 2005 द्वारा

• 93 वें संविधान संशोधन द्वारा किसके सम्बन्ध में प्रावधान किया गया ? -निजी शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश में आरक्षण का 

• किस वाद में दिये गये निर्णय के बाद संविधान में अनुच्छेद -15 ( 5 ) जोड़ा गया ? -पी.ए. इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य । 

• किस अनुच्छेद के अनुसार राज्य निजी शिक्षण संस्थाओं में छात्रों के प्रवेश के लिए स्थानों के आरक्षण का उपबन्ध कर सकती है ? - अनु . 15 ( 5 ) के अनुसार । 

• 93 वें संविधान संशोधन को किस वाद में संवैधानिक घोषित किया गया ? -अशोक ठाकुर बनाम भारत संघ के वाद में 

• लोक नियोजन में अवसर की समानता का उपबन्ध किया गया है ?-अनुच्छेद-16 में

 • संविधान की प्रस्तावना में प्रयुक्त समाजवादी ' शब्द के साथ किन अनुच्छेदों को पढ़ने से ' समान कार्य के लिए समान वेतन ' का मौलिक अधिकार उच्चतम न्यायालय ने निगमित किया ? - अनुच्छेद -14 तथा 16 को । 

• भारतीय संविधान का कौन - सा अनुच्छेद , भारत के सभी नागरिकों को लोक नियोजन में अवसर की समानता प्रत्याभूत करता है ? -अनुच्छेद 16 ( 1 ) और ( 2 ) ।

 • किस अनुच्छेद के तहत् किसी राज्य की सरकारी सेवाओं हेतु उस राज्य में निवास की योग्यता विहित करने वाली विधि बनायी जा सकती है ? - अनु . 16 ( 3 ) के तहत् 

• पिछड़े वर्गों हेतु आरक्षण का प्रावधान किस अनुच्छेद के तहत् किया गया है ? -अनुच्छेद 16 ( 4 ) के तहत्

• किस वाद में यह धारित किया गया कि पिछड़े वर्ग के निर्धारण के लिए केवल जाति सुसंगत नहीं है । इसके लिए गरीबी , शिक्षा का स्तर , पेशा आदि बातों पर भी ध्यान देना चाहिए ? -बालाजी बनाम मैसूर राज्य । 

• किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि पिछड़ेपन के निर्धारण के लिए जाति सुसंगत है और इसे प्रमुख आधार बनाया जा सकता है ? * -इन्द्रासाहनी बनाम भारत संघ ( 1993 ) , जो मण्डल मामले के नाम से प्रसिद्ध है । 

• किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि किसी अनारक्षित वर्ग का व्यक्ति आरक्षित वर्ग के परिवार में दत्तक , विवाह या अन्य किसी आधार पर प्रवेश पाने पर अनुच्छेद -15 ( 4 ) या अनुच्छेद -16 ( 4 ) के अन्तर्गत आरक्षण का लाभ नहीं प्राप्त कर सकता है ? - वलसम्मा पाल बनाम कोचीन विश्वविद्यालय । 

• ' इन्द्रासाहनी बनाम भारत संघ ' के वाद में विनिश्चय के समय उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश कौन थे ?- श्री एच.एम. कानिया 

• किस आधार पर पिछड़े वर्ग का निर्धारण नहीं किया जा सकता है ? -आर्थिक आधार पर ।

• किस अनुच्छेद के तहत अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजातियों को प्रोन्नति में आरक्षण का उपबन्ध किया गया है ? -अनुच्छेद 16 ( 4 - क ) के तहत् 

• किस संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों को प्रोन्नति में आरक्षण का प्रावधान किया गया ? -77 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1995 द्वारा ।

• किस वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के प्रभाव को समाप्त करने हेतु संविधान में अनुच्छेद -16 ( 4 - क ) जोड़ा गया ? -इन्द्रासाहनी बनाम भारत संघ ( 1993 ) के मामले में । 

• किस अनुच्छेद के अन्तर्गत अग्रनयन ( Carry for ward ) का सिद्धान्त विहित किया गया है ? - अनुच्छेद -16 ( 4 - ख ) के अन्तर्गत । 

• किस संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 16 ( 4 - ख ) को संविधान में जोड़ा गया - 81 वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा । 

• किस वाद में सरकार द्वारा बनाये गये अग्रनयन ( Carry Forward Rule ) के नियम को उच्चतम न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित किया था ? -देवासन बनाम भारत संघ के वाद में । 

• भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद भारत में किसी भी रूप में अस्पृश्यता का निषेध करता है ?- अनुच्छेद -17

 • ' प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स एक्ट ' - 1955 किस अनुच्छेद के क्रियान्वयन हेतु अधिनियमित किया गया है ? - अनुच्छेद -17 को ।

• अस्पृश्यता अपराध अधिनियम -1955 को अब किस नाम से जाना जाता है ? -सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम ( Protection of civil rights Act . ) 1955

• भारत में अस्पृश्यता निवारण किन - किन उपायों द्वारा किया जा सकता है ? * - कानून बनाकर , शिक्षा द्वारा तथा जनजागरण द्वारा 

• कौन - सा अनुच्छेद भारत में उपाधियों का अन्त करता है ? - अनुच्छेद -18 

• किन क्षेत्रों में राज्य को सम्मान प्रदान करने की अनुमति है ? -सेना व विद्या के क्षेत्र में । 

• कोई विदेशी नागरिक जो भारत में कोई विश्वास या लाभ का पद धारण किया है , किसकी अनुमति से किसी विदेशी राज्य से उपाधि ग्रहण कर सकता है ? - राष्ट्रपति की ।

 • किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि भारत रत्न , पद्म विभूषण और पद्म श्री अलंकरण अनु .18 ( 1 ) के अर्थों में उपाधि नहीं है ? - बालाजी राधवन बनाम भारत संध ( 1996 ) । 

• संविधान के किन अनुच्छेदों के तहत् ' स्वतंत्रता का अधिकार ' उपबन्धित किया गया है ? -अनुच्छेद 19-22 के तहत् 

• अनुच्छेद -19 के अन्तर्गत कौन सी स्वतंत्रतायें दी गयी हैं ? - वाक् आदि से सम्बन्धित स्वतंत्रतायें 

 • किस अनुच्छेद के तहत् अपराधों के लिए दोषसिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण प्रदान किया गया है ? -अनुच्छेद -20 के तहत् 

• प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार किस अनुच्छेद के तहत् प्रदान किया गया है ? -अनु .21 तहत् 

• अनुच्छेद -21 क के अन्तर्गत कौन - सा मूल अधिकार प्रदत्त किया गया है ?- शिक्षा का मूल अधिकार

 • अनुच्छेद -22 के द्वारा कौन - सा मूल अधिकार प्रदत्त किया गया है ? -कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण का मूल अधिकार ।

• मूल संविधान द्वारा अनुच्छेद 19 के तहत् कुल कितनी स्वतंत्रतायें उपबन्धित की गयी थी ? -7 ( सात )

• वर्तमान में अनुच्छेद 19 के तहत् कुल कितनी स्वतंत्रताओं का उल्लेख है ? -6 ( छः )

• अनुच्छेद -19 ( 1 - च ) में उपबन्धित सम्पत्ति के अधिकार को किस संविधान संशोधन द्वारा समाप्त कर दिया गया ? -44 वें संविधान संशोधन द्वारा 

• अनुच्छेद -19 द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रतायें किन्हें प्राप्त हैं ? -केवल भारतीय नागरिकों को । 

• किस अनुच्छेद के तहत् वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रत्याभूत की गयी है ? -अनुच्छेद 19 ( 1 ) ( क ) 

• किस अनुच्छेद के अन्तर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बन्धन हेतु आधार विहित किया गया है ? - अनुच्छेद -19 ( 2 ) के तहत 

• भारतीय संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता का स्पष्ट उल्लेख नहीं है किन्तु न्यायालय ने इसे किस अनुच्छेद के तहत् अन्तर्निहित माना है ? -अनुच्छेद 19 ( 1 ) ( क ) के तहत् 

• किस वाद में कहा गया कि , वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अन्तर्गत राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार एक मूल अधिकार है ? -भारत संघ बनाम नवीन जिन्दल का वाद

• किस वाद में धारित किया गया कि , वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में चुप रहने की स्वतंत्रता भी शमिल है ? -इमेनुअल बनाम केरल राज्य के वाद में ।

• मतदाता को उम्मीदवारों के सम्बन्ध में सूचना का अधिकार अनुच्छेद 19 ( 1 ) ( क ) के तहत् एक मूल अधिकार है किस वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया है ? -पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिवर्टीज बनाम भारत संघ के वाद में । 




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