प्रस्तावना
आज भारत को सवा सौ करोड़ जनता और पूरी दुनिया का कुल तकरीबन सात सो करोड़ की आबादी जिस भयावह स्थिति से गुजर रही है उस स्थिति को अनुभव करते हुए कोई भी जागृत व्यक्ति चुप नहीं बैठ सकता । आज पूरा विश्व गरीबी , बेरोजगारी , शोषण , आर्थिक विषमता से लेकर हिंसा , आतंकवाद और धार्मिक असहिष्णुता जैसी संवेदनशील समस्याओं से गुजरते हुए विनाश की कगार पर खड़ा है । दुनिया में हर रोज़ तकरीबन 3 हजार बच्चे भूख और कुपोषण से मर रहे हैं और लगभग 100 करोड़ लोग रोज़ भूखे सो रहे हैं । हिंसा , युद्ध और आतंकवाद की वजह से हर साल लाखों लोग अपनी जान गंवाते हैं । अगर सिर्फ भारत की बात की जाए तो प्रतिवर्ष तकरीबन । करोड़ 10 लाख बेरोजगारों की फौज तैयार हो रही है । शोषण और आर्थिक विषमता की बात की जाए तो पूरी दुनिया के 7 प्रतिशत लोगों का 85 प्रतिशत संसाधनों पर कब्जा है और भारत में तो लगभग 100 पूँजीपतियों के पास देश के 52 प्रतिशत संसाधन मौजूद हैं जल , जंगल , जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर कार्पोरेट घरानों का कब्जा दिनों - दिन बढ़ता जा रहा है । हर रोज़ किसान , आदिवासी और दलित जैसे हाशिए के लोगों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर उनसे जल , जंगल और ज़मीन छीने जा रहे हैं । धार्मिक और सामाजिक असहिष्णुता , नारी उत्पीडन , नैतिक अघोपतन अपनी सीमा का उल्लंघन कर चुके हैं । दुनिया की बुनियादी आर्थिक , राजनैतिक और सामाजिक समस्याओं को सामन्तवाद और पूँजीवाद से लेकर साम्यवाद और समाजवाद तक का सारा ढाँचा सुलझाने में असमर्थ रहा है । इन सभी समस्याओं को लेकर अपने देश समेत पूरी दुनिया में उथल - पुथल मची है । उन समस्याओं का समाधान करने के लिए अनेक लोगों ने विविध प्रयास किए , जो अब भी जारी है ; मगर सारे प्रयास कुछ सीमा तक पहुँच कर समाप्त हो जाते हैं या समाप्त कर दिए जाते हैं । रूसो से लेकर टॉलस्टाय और मार्क्स से लेकर गाँधी तक जितनी भी विचारधाराओं का प्रयास चल रहा है , सारे प्रयास एक सीमा में बँध से गए हैं । भारत में आजादी के बाद आचार्य विनोबा भावे , लोकनायक जयप्रकाश नारायण और आज केसमय में अण्णा हजारे द्वारा किए गए अभूतपूर्व प्रयास एक कदम आगे बढ़ने के बाद रास्ते में कहीं खो गए । सवाल इस बात का है कि इन तमाम ईमानदार प्रयासों में कमी कहाँ रह जाती है । क्या व्यवस्थाओं का विश्लेषण करने में , रणनीति में , व्यक्तित्व में या इन तीनो में ही इस पुस्तिका में व्यवस्था के विश्लेषण में रह गई कमी को दूर करने की कोशिश की गई है । शरीर के ऊपरी हिस्से में दिखाई देने वाला फोड़ा रोग का लक्षण हो सकता है , मगर रोग का कारण नहीं । ऐसे ही देश और दुनिया में बढ़ रही गरीबी , बेरोजगारी , भ्रष्टाचार , हिंसा , आतंकवाद , अन्याय , अत्याचार इत्यादि समाज के रोग के लक्षण हैं , कारण नहीं । असली कारण तो विनिमय अर्थशास्त्र के आधार पर खड़ा वित्तीय पूँजी का संस्थान हैं । अर्थशास्त्र का दार्शनिक आधार ' विनिमय ' है जो व्यक्ति , समाज और प्रकृति के बीच के सतत व सन्तुलित सम्बन्ध को विखण्डित कर देता है वित्तीय पूँजी की इमारत का ढाँचा इतना जटिल है कि इसे समझने के लिए बड़े से बड़े अर्थशास्त्री का दिमाग भी चकरा जाता है और इतना मजबूत है कि बड़े से बड़े क्रान्तिकारियों का सामर्थ्य भी बौना साबित होता है । वित्तीय पूँजी के खेल को समझकर जिन गिने - चुने राष्ट्रनेताओं ने कदम उठाने का साहस किया , उनको खत्म करके उनके सभी प्रयासों को समाप्त कर दिया गया । इस पुस्तिका में वित्तीय पूँजी की तकनीकी कार्यान्वन की सारी जटिल प्रक्रियाओं का खुलासा किया गया है जो इस पुस्तिका का सार है - अक्षय कुमार संगठक , युवा क्रान्ति
किसकी दुनिया ? किसका शासन ? किसका पैसा ?
तीन यक्ष प्रश्न हैं जो दुनिया में बहुत कम लोग समझ पाते हैं और जिनको समझे बिना व्यवस्था परिवर्तन एक असम्भव चुनौती है । दुनिया पर कौन शासन करता है ? दुनिया में इतना अन्याय , अत्याचार , गरीबी , बेरोज़गारी , हिंसा , युद्ध इत्यादि क्यों है ? दुनिया का हर देश और लगभग सभी व्यक्ति कर्ज में है तो यह कर्ज है किसका ? पैसा क्या है और कर्ज देने के लिए इसे बनाता / छापता कौन है ?
बदल गए गुलामी के तरीक
हम कभी अंग्रेजों से आजाद नहीं हुए , बस शासन करने के तरीके बदल गए और हमने आज़ादी का भ्रम पाल लिया । यह याद रखना ज़रूरी है कि सबसे पहले वे लोग गुलाम बनते हैं जिनको ये भ्रम हो जाता है कि वे आज़ाद हैं ।
1862 में ब्रिटिश वैकिंग द्वारा अमेरिकी बैंकर्स के लिए एक सुझाव -
“ मैं और मेरे यूरोपियन मित्रों को यह जानकर खुशी हुई कि गृहयुद्ध के बाद अमेरिका में जातिगत गुलामी खत्म हो जाएगी , क्योंकि इसमें मालिक को गुलामों कि सारी जिम्मेदारियाँ भी उठानी पड़ती हैं । जबकि सबसे सरल तरीका यह है कि पूँजी द्वारा लोगों की आमदनी नियंत्रित करके उनको नियंत्रित किया जाए । और यह सब किया जा सकता है पैसे को नियंत्रित करके । "
दिखाए गए पिरामिड में शीर्ष पर विश्व के शासक विराजमान हैं और बिल्कुल नीचे शोषित जनता है , जो निरन्तर अभाव में जी रही है । जनता पर नियंत्रण के लिए दुनिया के हर देश में सरकारें विराजमान है , जो आम तौर पर जनता के हित में नहीं बल्कि विश्व के शासकों के लिए काम करती हैं । मीडिया और शिक्षा व्यवस्था सरकार के सहयोग से विश्व के शासकों के पक्ष में लोगो का मानस निर्माण ( मानसिक गुलामी ) का काम करती है । शोषण के विरोध में खड़े लोगों का दमन करने के लिए खुफिया संस्थाएं , सेना , पुलिस , कोर्ट , जेल इत्यादि की व्यवस्था बना रखी है । सरकारों पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ बैठी हैं जो विछ के सभी संसाधनों को नियंत्रित करती हैं । अधिकतर लोगों को यह लगता है की बहुराष्ट्रीय कम्पनिया ही स्वतंत्र रूप से विश्व को चलाती हैं । लेकिन इनके ऊपर एक ऐसी व्यवस्था है , जो सही मायने में विच का आर्थिक नियंत्रण करते हुए शासकों के साम्राज्य को बनाए हुए है । यह नियंत्रण ब्याज , कर ( टक्स ) राजस्व , केन्द्रीय बैंक , विश्व बैंक , अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ( आई.एम.एफ. ) और बैंक ऑफ इंटरनेशनल सेटलमेंट जैसी संस्थाओं के माध्यम से होता है । व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर लोग किसी कानून में परिवर्तन चाहते हैं और दलील देते है कि सख्त से सख्त कानून बना देने से समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
जबकि वे लोग यह नहीं जानते की व्यवस्था का ढाँचा कुछ और ही है और सरकार स्वतंत्र नहीं हैं । इस व्यवस्था को चलाने के लिए कुछ लोगों ने एक रणनीतिकार समूह बनाया हुआ है , जो षड्यंत्रकारी ढंग से छिपकर विश्व की दशा और दिशा तय करते हैं । इसके ऊपर 500 लोगों का एक आयोग बना हुआ है जो विश्व के सबसे अमीर और ताकतवर उप - परिवार है । इनके ऊपर 13 लोगों की शीर्ष परिषद है जो विश्व के सबसे ताकतवर परिवार हैं , जो विश्व के शासकों के मंत्री के रूप में काम करते हैं और ये सभी अपना एक - एक प्रतिनिधि लन्दन शहर के पार्षद के रूप में नियुक्त करते हैं । इन 13 लोगों के आयोग में रोथशिल्ड परिवार , रॉकफेलर परिवार , मोरगन परिवार , स्किफ परिवार प्रमुख हैं । प्रसिद्ध फोर्ड कम्पनी के संस्थापक हेनरी फोर्ड
ने इस व्यवस्था के बारे में कहा है , " यह अच्छा है कि देश के लोग हमारी बैंकिंग और मौद्रिक प्रणाली ( Monetary System ) को नहीं समझते । अगर समझते तो मुझे विश्वास है कि कल सुबह होने से पहले क्रान्ति हो जाएगी ।
तो ऐसी क्या बात है , जिसे अगर देश के लोग समझ लें तो क्रान्ति होनी निश्चित है । इस बात को समझने के लिए हमें बैंकिंग प्रणाली के साथ यह भी समझना होगा की आखिरकार यह ' पैसा ' है क्या ?
एक रुपए का नोट और अन्य नोट
जैसा की ऊपर के चित्रों में आप देख रहे हैं , तीन तरह के रुपए हैं , एक रुपया चाँदी का है जो कि भारत सरकार ने जारी किया है , जिसकी कीमत एक तोला ( 10 ग्राम ) चाँदी है । दूसरे चित्र में आप एक रुपए का नोट देखेंगे , यह भी भारत सरकार ने जारी किया है और इस पर वित्त मंत्रालय के वित्त सचिव के हस्ताक्षर हैं । तीसरी तस्वीर में एक रुपए का सिक्का है और यह भी भारत सरकार द्वारा जारी किया गया है । लेकिन 2 रुपए से लेकर 1,000 रुपए तक सभी नोट अलग तरह के मिलेंगे । इसमें पहला अन्तर यह है कि यह भारत सरकार द्वारा नहीं , बल्कि भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी किया गया है और भारत सरकार ने इसे गारंटी दी है । इन नोटों में से आप यहाँ एक 100 रुपए के नोट की तस्वीर देखो । जिस पर लिखा है - " मैं धारक को 100 रुपए देने का वचन अदा करता हूँ । " और इस के नीचे भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं । इस तरह की बात आप 2 से 1,000 रुपए के सभी नोटों में देख सकते हैं , जो बात एक रुपए के नोट में नज़र नहीं आती है । मतलब यह है कि यह 100 रुपया नहीं है सिर्फ 100 रुपए की रसीद है जिसे अगर आप भारतीय रिज़र्व बैंक को दें तो 1933 से पहले वह आपको 100 चाँदी के रुपए देता , परन्तु अब नहीं मिलेंगे । इसी बात को आगे विस्तृत रूप से समझाया जाएगा ।
बैंकों का जन्म
पश्चिमी देशों में पहले लोग सुनारों के पास अपना सोना चांदी सुरक्षित रखते थे। बदले में वो रसीद देते थे।जब कोई सुनारों के पास 100 तोला चांदी के सिक्के यानी ₹100 जमा करने जाता था तो बदले में वे उसे एक कागज की रसीद अपनी मोहर लगा कर देता था। जिस पर लिखा रहता था कि मैं धारक को 100 तोला चांदी देने का वचन अदा करता हूं। यही रसीद आज के नोट की तरह रहती थी। जिस रसीद को वह व्यक्ति अगर सुनार को वापस देता तो उसे 100 तोला चांदी मिल जाती। धीरे-धीरे इस रसीद पर लोगों का विश्वास बन गया कि कोई भी व्यक्ति यह रसीद लेकर जारी करने वाले सुनार के पास लेकर जाएगा तो बदले में उसे उतनी चांदी मिलेगी। इस प्रकार यही रसीद प्रतीकात्मक मुद्रा के रूप में प्रयोग होने लगी और बहुत कम लोग असली चांदी सुनारों से मांगते थे।आम तौर पर उसे वापिस लेने के लिए एक समय में 10 प्रतिशत से भी कम लोग आते थे । इसे देखते हुए सुनारों ने 10 प्रतिशत अपने पास जमा रखकर बाकि सोना और चाँदी लोगों को ऋण के रूप में ब्याज पर देना शुरू किया । इस तरह सोना और चाँदी अब अन्य - अन्य लोगों के पास से घूमता हुआ वापस सुनारों के पास आने लगा । उसका भी 10 प्रतिशत रखकर बाकि फिर से ब्याज पर चढ़ाया जाने लगा और इस तरह से एक ही सोने को कई बार ब्याज पर दिया जाने लगा । इस प्रक्रिया को बैंकिंग की भाषा में अंश रिज़र्व बैंकिंग ( Fraction Reserve Banking ) कहा जाता है । इन लोगों को मनी जर कहते थे । सुनारों ने व्यवस्था बनाई कि जब कोई व्यक्ति रसीद के बदले सोना या चाँदी माँगने आए तो उसे वह लौटा दिया जाए और बाकी के सोना या चाँदी ( जो आम तौर पर लगभग 90 प्रतिशत होता था और सुनारों के पास जमा रहता था ) को उसके असली मालिक से बिना पूछे वे कर्ज के रूप में देकर ब्याज कमाते थे ।
मान लो किसी शहर में कुल 100 तोला चाँदी है जो एक सुनार के पास जमा है । इसमें से वह 10 तोला वापस देने के लिए रिज़र्व के रूप में रख लेता है और शेष 90 तोला को ऋण के रूप में ब्याज पर देता है । ब्याज की दर अगर 6 प्रतिशत वार्षिक भी हो तो 90 तोला चाँदी का वार्षिक ब्याज 5.4 तोला बनता है । इसमें सबसे बड़ी धोखाधड़ी यह हुई कि देश में पैसे की मात्रा जो 100 थी अब वह 190 हो गई । एक तरह से 90 की रकम सुनार ने जादुई तरीके से बना कर दी । लेकिन यह धोखाधड़ी यहीं नहीं रुकी । कर्ज़ पर 90 तोला चाँदी लेने वाले व्यक्ति ने उसे खर्च किया होगा । इस तरह वह चाँदी बाज़ार में घूमकर अन्ततः उसी सुनार के पास जमा हो जाएगी । जिसके बदले सुनार फिर से वायदे की एक रसीद काट कर दे देगा । उसका भी 10 प्रतिशत रखकर बाकी का पैसा कर्ज के रूप में दे दिया जाएगा , जिस पर वह और ब्याज लेगा और पैसे की मात्रा फिर से बढ़ जाएगी ।
ऊपर की तस्वीर में आप देखेंगे की 90 तोला चाँदी में से 9 तोला रखकर 81 तोला कर्ज के रूप में दी गई , जिस पर 4.86 तोला का ब्याज मिला और पैसे की मात्रा बढ़कर 271 हो गई ।
इसी तरह से यह प्रक्रिया बार - बार चलती रहने पर अन्त में असल रूप में 100 तोला चाँदी होते भी 1,000 तोला जमा राशि के रूप में दिखाई देती है । जिसके बदले 1,000 तोला की रसीद देश में फैल जाती है । जिससे पैसे की मात्रा 100 से बढ़कर 1,000 हो जाती है , जबकि कुल 100 तोला चाँदी अभी भी रिज़र्व के रूप में सुनार के पास रखी है । ( कृपया यह ध्यान रखें कि सुनार द्वारा जारी चाँदी की रसीद बाज़ार में प्रतीकात्मक मुद्रा के रूप में इस्तेमाल हो रही है । ) 100 तोला चाँदी होते हुए भी सुनार ने 900 तोला चाँदी रहस्यमयी ढंग से कर्ज पर दे रखी है । जिस पर वह सालाना 54 तोला चाँदी ब्याज के रूप में वसूलता है । परन्तु असलियत में यह प्रक्रिया किसी और ढंग से घटित होती है , जिसे हमें किसी भी अर्थशास्त्र की किताब में नहीं समझाया गया है । इसे आगे समझाने का प्रयत्न किया गया है ।
आधूनिक पैसे की प्रक्रिया
1960 के दशक में शिकागो फेडरल रिज़र्व द्वारा आधुनिक पैसे की प्रक्रिया Modem Money Mechanics नामक एक पुस्तिका प्रकाशित की गई जिसमें साफ लिखा है कि बैंक वास्तव में जमा किए गए पैसे को कर्ज के रूप में नहीं देते । अगर वे ऐसा करते तो कोई अतिरिक्त पैसा नहीं बनता । वे ऋण ( loan ) देते समय उधारकर्ताओं के लेन - देन खातों में क्रेडिट के बदले में ' वचन नोट ' स्वीकार करते हैं । जिसका अर्थ यह है की जब आप कर्ज लेने जाते हैं तो वे पहले से जमा पैसे को कर्ज के रूप में नहीं देते , बल्कि आपसे कहते हैं कि आप हमें यह वचन दो की आप जितना पैसा ऋण लेंगे उसे आप ब्याज समेत वापस लौटाओगे । आपके इस वायदे के बदले में वो एक रसीद काटकर देते हैं , जिसे आप पैसा मान लेते हो । सुनार भी ऐसा ही करते थे जिसे पहले समझाया गया है ।
ऊपर दिए गए चित्र में आप इसे समझ सकते हैं ।
इस तरह सुनार असली पैसे ( सुनार के पास जमा सोना - चाँदी ; वास्तविक मुद्रा ) से नी गुना पैसा ऋण देता था । अगर उस पर 6 प्रतिशत वार्षिक व्याज भी लगे , तो वह प्रतिशत ना रहकर ( 9x 0.06 x 100 = 54 % ) 54 प्रतिशत हो जाता था । 54 प्रतिशत सालाना ब्याज का अर्थ है दो साल में सारा सोना - चाँदी इनका हो जाना । चूँकि सब लोग अपना सारा पैसा सुनारों के पास नहीं रखते थे इसलिए दो साल की जगह इस काम को होने में कई साल लगे ।
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किताब से ली गयी इमेज |
जब किसी को कर्ज की जरूरत पड़ती है तो बैंक सुनारों की तरह आपसे एक वायदा लिखवा लेते हैं कि आपको ब्याज सहित कर्ज वापस लौटना पड़ेगा । जिसके बदले वो आपको कर्ज देने की बात करते हैं । पर असली पैसा ना होने की वजह से वो सिर्फ आपके खातों में लिख देते हैं जिस पर वे आपसे ब्याज वसूलते हैं । अब अगर किसी को एक लाख रुपए कर्ज के रूप में चाहिए तो बैंक दे देते हैं और आपके खातों में लिख देते हैं , लिखे गए पैसों का 10 प्रतिशत यानि 10,000 रुपए ही रिज़र्व के रूप में रखना पड़ता है , जिसे वो रिज़र्व बैंक से उधार लेते हैं । इस व्यवस्था को आप नीचे दी गई तस्वीर से समझ सकते हैं ।
पैसा बनता कैैसे है
जब भारत सरकार को पैसे की आवश्यकता पड़ती है तो वो जनता पर टैक्स लगाती है और आवश्यकता पूरी ना होने पर भारत सरकार अपना खुद का पैसा ना बनाकर कर्ज पर पैसे लेती है । मान लो कि भारत सरकार को 1,000 रूपए चाहिए तो वह कागज़ पर बैंक को यह वायदा करती है कि व्याज समेत पैसा लौटा देगी । इस वायदे को सरकारी प्रतिभूति ( बांड ) कहते हैं । जिसे भारत सरकार का वित्त मंत्रालय भारतीय रिज़र्व बैंक के पास लेकर जाता है और बदले में भारतीय रिज़र्व बैंक 1,000 रुपए का नोट छापकर भारत सरकार को दे देता है ।
अब मान लिया जाए की भारत सरकार ईमानदार लोगों द्वारा संचालित है और किसी तरह का भ्रष्टाचार नहीं है , तो वह सारे रुपए जनकल्याण की योजना
में खर्च कर देती है । पैसा जनता के पास पहुँचता है और जनता इस एक हज़ार रुपए को व्यावसायिक बैंकों , जैसे - आई.सी.आई.सी.आई. बैंक , सिटी बैंक , एक्सिस बैंक इत्यादि में जमा कर देती है और बदले में बैंक उनके खाते में पैसा लिख देता है ।
अब इस एक हज़ार के नोट को रखकर व्यावसायिक बैंक 9 गुणा पैसा कर्ज के रूप में दे सकता है । भारत में तो यह 24 गुणा तक है । पैसे की मात्रा बढ़ने से आई महँगाई को रोकने का हवाला देकर अब केन्द्रीय बैंक इस एक हजार रुपए के बांड को व्यावसायिक बैंक को एक हजार रुपए में वेच देता है , जिसे ओपन मार्केट ऑपरेशंस कहा जाता है ।
अब आप देख पा रहे हैं कि केन्द्रीय बैंक द्वारा बनाया गया उसका 1,000 रुपए का नोट उसके पास वापस आ गया है , इस तरह केन्द्रीय बैंक पैसे ना बनाकर सिर्फ एक विचौलिए का काम कर रहा है और जिसके बिना तस्वीर कुछ ऐसी होगी ।👇
लाइनों को सीधा कर दे तो साफ दिखाई देता है की जब भी भारत सरकार को कर्ज की आवश्यकता पड़ती है तो वह केन्द्रीय बैंक के माध्यम से व्यावसायिक बैंक को कर्जे का बांड देती है और व्यावसायिक बैंको के पास कोई पैसा ना होते हुए भी वो उतना पैसा भारत सरकार के खाते में लिख देते हैं । खर्च करने पर वह पैसा भारत सरकार के खाते से अब जनता के खाते में लिखा रहता है , इसे आप आगे की तस्वीर में साफ देख सकते हैं।👇
केन्द्रीय बैंकों का काम सिर्फ खातों में लिखे गए पैसों के लिए रिज़र्व रखने के लिए बैंकों को आवश्यक पैसों की आपूर्ति करना होता है । आप तस्वीर में देख सकते हैं कि इसे बैंक कर्ज के रूप में ले लेता है , इसे हम पहले भी समझ चुके हैं ।
फेडरल रिज़र्व बोर्ड के अध्यक्ष मेरिनर ऐकिलिस 1935 में इस प्रक्रिया के बारे में लिखते हैं - “ सरकारी बांड की खरीद में बैंकिंग प्रणाली बिल्कुल नया पैसा बनाती है । जब बैंक सरकार द्वारा जारी किए गए 1 अरब करोड़ डॉलर के बांड खरीदता है तो वो सरकारी खाते में 1 अरब करोड़ डॉलर लिख देता है । इस तरह से वे सिर्फ खाते में लिखकर 1 अरब डॉलर पैदा कर देते हैं । " इस प्रक्रिया को और आसानी से अगली तस्वीर से समझा जा सकता है ।👇
इसमें जब भी भारत सरकार या देश की जनता को कर्ज लेने के लिए पैसे की आवश्यकता पड़ती है तो वे व्याज समेत पैसा लौटाने का वायदा लिखकर व्यावसायिक बैंक के पास जाते हैं ; जिसके बदले व्यावसायिक बैंक उतनी ही रकम आपके खाते में चढ़ा देता है । जिस पर सालाना लाखों - करोड़ों रुपया ब्याज माँगते हैं । खाते में लिखे गए पैसे का 10 प्रतिशत रिज़र्व के रूप में होना चाहिए , जिसे वे भारतीय रिज़र्व बैंक से कर्ज पर लेते हैं । इस तस्वीर में आप इसे समझ सकते हैं ।
इस तरह से देश के 95 प्रतिशत पैसे बनाने का काम व्यावसायिक बैंकों का है । जो कि सिर्फ खातों में ही बनता है और लिखा रहता है । भारतीय रिज़र्व बैंक मात्र । प्रतिशत पैसे ही बनाता है , जो कागज़ के नोट के रूप में दिखाई पड़ते हैं । इस विषय पर अर्थशास्त्री जॉन केनेथ गालब्रेथ कहते हैं ,
" बैंकों के पैसे बनाने की प्रक्रिया इतनी सरल है कि दिमाग चकरा जाता है । " दिमाग इसलिए चकरा जाता है क्योंकि हमें कुछ और ही सिखाया गया है । रॉबर्ट बी . एंडरसन , अमेरिका के वित्त सचिव ( 1959 ) , " जब एक बैंक कर्ज देता है तो यह केवल कर्ज की राशि बैंक अकाउंट में लिख देता है । यह पैसे बैंक किसी और के जमा किए गए पैसों से नहीं लेकर देता । यह पैसा उधार लेने वालों के लिए बैंकों ने नया बनाकर दिया होता है । "
क्रेडिट कार्ड स्कीम
क्रेडिट कार्ड से खरीददारी करने पर कार्ड स्वैप करने के बाद आप एक परची पर अपने हस्ताक्षर करके दुकानदार को देते हैं । परची पर आपके हस्ताक्षर करते ही वह पैसा बन जाती है , जिसे व्यापारी अपने मर्चेट अकाउंट में जमा कर देता है । यह परची क्रेडिट कार्ड कम्पनी को भेज दी जाती है जिसके बण्डल बनाकर वह बैंकों को भेज देती है । बैंक आपको एक स्टेटमैंट भेज देता है जिसका आप भुगतान कर देते हो । पूरी प्रक्रिया में कहीं भी बैंक ने आपको अपनी जेब से या अपने जमा खातों में से कोई पैसा दिया ? बल्कि वह आपकी चार्ज स्लिप पर किए वायदे को अपनी सम्पत्ति दिखाकर क्रेडिट में बदल देता है । आपका वायदा ही पैसा है । अगर आप किसी को कोई पैसा उधार दो , तो आपकी सम्पत्ति घट जाएगी ; पर उधार देने पर बैंकों की सम्पत्ति बढ़ जाती है । आपका वायदा उनकी सम्पत्ति बन जाता है जिसके बदले वे आपके खातों में उतने अंक लिख देते हैं । जिसे आप पैसा मानते है ।
नए पैसे को मूल्य कौन देता है?
मान लो कोई चीज 100 रुपए की आती है और अब बैंकों ने नया पैसा बनाकर कर्ज दे दिया , जिससे देश के पैसे की मात्रा 10 प्रतिशत बढ़ गई । अब वह चीज़ 110 की आएगी । बैंक हमारी ही जेब से मूल्य चुराकर कर्ज का पैसा देते है । इस चोरी को महँगाई कहते हैं । हर साल हमारे पैसे को हमें ही कर्ज पर देकर बैंक ब्याज और महँगाई से लाखों करोड रुपए लूट लेते हैं । महँगाई इसी बैंकिंग प्रणाली का नतीजा है । कोई भी व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री बन जाए या किसी भी दल की सरकार बन जाए , बिना इस व्यवस्था को बदले महँगाई को काबू में नहीं लाया जा सकता ।
कोर्ट में चुनौती
अमेरिका में 1967 में डेली नामक व्यक्ति ने घर बनाने के लिए 14,000 डॉलर का ऋण ( होम लोन ) यह कहकर लौटाने से मना कर दिया कि बैंक ने उसे कोई असली पैसे दिए ही नहीं । पहले तो सबको यह दलील एक बकवास लग रही थी । पर जब बैंक के मालिक जे.पी. मोरगन ने माना कि “ बैंक तो लोन के पैसे हवा में से बनाता है " तो न्यायधीश मार्टिन महोने चौंककर बोले , “ यह मामला मुझे धोखाधड़ी ( fraud ) लग रहा है ” और फैसला डैली के हक में सुना दिया । पूरी बैंकिंग व्यवस्था के लिए यह एक खतरा होता अगर सभी अपना कर्जा देने से मना कर देते । न्यायधीश मार्टिन महोने ने बाद में जब इस पूरी बैंकिंग व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश की तो 6 महीने के अन्दर रहस्यमयी ढंग से ज़हर की वजह से उनकी मृत्यु हो गई ।
केंद्रीय बैंक
केन्द्रीय बैंक का एक महत्वपूर्ण काम देश में पैसे को मात्रा ( money supply ) नियंत्रित करने का है जिसे दह ओपन मार्केट औपरेशंस के अलावा दो महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं के द्वारा करता है । 0 व्याज दरे या रिजर्व रेशो घटाकर याज दरे या रिजर्व रेशो बढ़ाकर जद केन्द्रीय बैंक ब्याज दरें या रिजर्व रेशो घटा देता है तो सस्ते ब्याज होने से और देको के पास ज्यादा पैसा होने के कारण देश में लोग ज्यादा कर्ज लेते हैं । इस वजह से पैसों की मात्रा बढ़ जाती है । ज्यादा पैसा होने से महंगाई का दौर आता है । बैंक लोगों से , व्याज से और सस्ते पैसे से निवेश करके खूब कमाते हैं । जब पैसे की मात्रा बढ़ जाती है तो महँगाई कम करने का टॉनिक देकर ब्याज दरें या रिजर्व रेशो बढ़ा दी जाती है , जिससे एकाएक देश में पैसे का अकाल पड़ जाता है । कम पैसा ( शॉर्ट मनी ) होने से मन्दी का दौर आता है और जिसमें ये लोगों के माल को कौड़ियों के भाव खरीद कर लूटते हैं , जिसे आगे समझाया गया है ।
अगर आपको यह जानना है-1.मंदी क्या है?,2.ब्याज कहां से आये?,3.बेरोजगारी, भुखमरी और लालच क्यों?,4.आत्महत्याएं,5.आत्महत्या या हत्या?,16.कर्ज का जाल,17.बंधुआ मजदूरी,18.बजट2015-16,19.सरकार को टैक्स देना बेवकूफी है।,20.हर साल पच्चीस लाख करोड़ की लूट ये सारी चीजें क्यों हो रही हैं आज आपको पता चलेगा।
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