(Section-B: Short Answer Type Questions) इस खण्ड में प्रश्न संख्या 2 से 6 लघु उत्तरीय प्रश्न हैं। परीक्षार्थियों को सभी पाँच प्रश्नों का उत्तर देना अनिवार्य है। प्रत्येक प्रश्न के लिए 5 अंक निर्धारित हैं। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर लगभग 200 शब्दों में दीजिए। (5 x 5 = 25 अंक
इकाई-1
प्रश्न 2 (1) शान्तिपर्व में उल्लिखित भीष्म के विचारों का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए।
उत्तर- राजदर्शन के विद्वान् आचार्य भीष्म पितामह ने महाभारत के शान्तिपर्व में राजधर्म का महत्त्व, राजा की उपयोगिता और राज्य व्यवस्था को बतलाया है। सामाजिक व्यवस्था को चलाने के लिए राजा का होना आवश्यक है। राजा को आदर्श पथ-प्रदर्शक, रक्षक और उत्तम शासक एवं उच्च आचरण का होना चाहिए, जिससे समाज उसका अनुसरण कर सके।
समाज की रक्षा तथा राज्य का शासन चलाने के लिए राजा को कुछ आदर्शों का पालन करना आवश्यक है। इसकी व्यवस्था आचार्य भीष्म ने इस प्रकार की है-"जो ज्ञान और ज्ञानियों का सम्मान करता है, दूसरे के भले में रत रहता है, सज्जनों के बताये हुए मार्ग पर चलता है, त्यागी है, वहीं राजा राज्य को चलाने का अधिकारी हो सकता है।"
शासन का संचालन वही व्यक्ति कर सकता है जिसमें सेवा की भावना और सेवक के विचार हो सहिष्णु, गुणग्राही, त्यागी और अच्छे मार्ग पर चलने वाला ही वास्तविक अधिकारी है। स्वार्थी और लोभ ऐसे पद का निर्वाह नहीं कर सकते हैं।
भीष्म पितामह प्रजा के कल्याण, राज्य के अभ्युदय और राज्य संचालन हेतु राजा के लिए राजध का पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक मानते हैं। भीष्म पितामह ने कहा है कि "जो राजा प्रजा का कल्याण करा वाला एवं स्वयं स्वार्थहीन होता है वही वस्तुतः अपने राज्य की अच्छी तरह से देखरेख कर सकता है। उस सत्यनिष्ठ एवं कर्तव्यपूर्ण कार्यों का प्रजा पर प्रभाव पड़ता है और राजनीति में स्थिरता रहती है।"
प्रश्न 2 (ii) शान्तिपर्व में राजधर्म की अवधारणा की विवेचना कीजिए।
उत्तर- प्रजा की सम्पन्नता, सुख-शान्ति और समृद्धि ही राजा का एकमात्र लक्ष्य है। राजा का प्रत्येक कार्य प्रजा की प्रसन्नता (प्रजा-रंजन) एवं उसके कल्याणार्थ ही होना चाहिए। उस राजा को सर्वश्रेष्ठ कहन चाहिए जिसके राज्य में प्रजा पिता के घर में पुत्र की भाँति निर्भय विचरती है। राजा को सदैव उद्यमशी रहना चाहिए जिसके साथ सन्धि करना उचित है, उसके साथ सन्धि करनी चाहिए, जिससे विरोध करने उचित है, उससे विरोध करना चाहिए। चारों वर्णों के धर्म की रक्षा करना राजा का कर्तव्य है, क्योंकि धर्मसंकट से प्रजा को बचाना ही राजा का सनातन धर्म है।
जो राजा सदा प्रजानुरंजन में प्रवृत्त रहता है वह कभी भी शत्रुओं से पराजित होकर स्थान भ्रष्ट न होता। श्रेष्ठ राजा का कर्तव्य है कि उसके राज्य में कहीं भी चोरी, डकैती, मत्सर और अधर्म आदि न हो उसे सदा सनातन धर्म का पालन करना चाहिए। नियमानुसार जासूसों को नियुक्त करना, दूत भेजना, समयानुसार दान और मत्सर-रहित पुरुषों से उत्तम युक्ति ग्रहण करना, दुष्ट उपाय के सहारे प्रजा से कर-संग्रह न करना, सत्यवादी होना, सरल व कुटिल उपाय से शत्रुओं के मध्य मतभेद कराना, साधु पुरुषों का संग्रह करना, बुद्धिमानों की सेवा, सैनिकों को उत्साहित करना, सदा प्रजा की अवस्था देखते हुए कोष बढ़ाना, दुष्ट पुरुषों का संग न करना और सदा उद्योगी होकर नीति मार्ग का अनुगामी होना राजा का कर्तव्य है। निर्बल शत्रु की भी अवज्ञा करना बलवान पुरुष को उचित नहीं है, क्योंकि अग्नि तनिक सी होने पर भी भस्म करती है और थोड़ा-सा विष भी प्राणनाश कर सकता है। अधर्म एवं अन्याय के विनाश के हेतु ब्रह्मा ने क्षत्रिय जाति को उत्पन्न किया है, अतः पराक्रमयुक्त होकर शत्रुजय, प्रजा पालन, अनेक दक्षिणा सहित यज्ञ और युद्ध करना उसका कर्तव्य है। जो राजा प्रतिपालन करने योग्य प्राणियों का सदा पालन करता है, वही राजा उत्तम है।