अंग्रेजों को खूब छकाए जेपी.धोती को रस्सी बना लांघ गए जेल

 स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए घर - घर में अकुलाहट थी , हर आंख में आजादी के सपने थे । स्वातंत्र्य समर में बलिया का योगदान स्वर्णाक्षरों में अंकित है । जिले को यूं ही बागी बलिया का खिताब नहीं मिला । यहां के अगणित वीरों ने आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया । अंग्रेजों के गोला - बारूद भी क्रांतिवीरों की राह नहीं रोक सके । इसी कड़ी में लोकनायक जयप्रकाश नारायण का नाम भी अग्रणी है । उनके • संघर्ष की कहानी बता रहे हैं बलिया से लवकुश सिंह ... ।

गुलामी की जंजीरों को करने की अकुलाहट में जयप्रकाश नारायण ( जेपी ) ने जुल्म की कभी परवाह नहीं की । अंग्रेजी सरकार को चोट पर चोट देते रहे । बार - बार जेल जाने पर भी हौसले में कोई कमी नहीं थी । यही कारण था कि उनकी गतिविधियों ने अंग्रेजों की नींद उड़ा रखी थी । मुंबई में अगस्त क्रांति की घोषणा हुई तो नौ अगस्त , 1942 को सूर्योदय से पहले ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया । अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे का उत्साह देशभर में तरंगित हो रहा था । उसी लहर में बलिया , बंगाल में मेदिनापुर , महाराष्ट्र में सतारा कई दिनों तक स्वतंत्र रहे । उस दौरान जेपी को हजारीबाग जेल में बंद किया गया था । तब उनकी उम्र 40 वर्ष थी । जेपी जेल से आने को व्याकुल थे । आजादी के लिए . खून उबाल मार रहा था । नौ नवंबर , 1942 को दीपावली का त्योहार था । जेल में कर्मचारियों के लिए दावत का आयोजन हुआ । कार्यक्रम का संचालन साहित्यकार बेनीपुरी कर रहे थे । उसी समय जेपी पांच साथियों संग धोतियों की रस्सी बनाकर जेल की दीवार लांघ गए ।

वाराणसी में भूमिगत क्रांतिकारियों से मिले

जेल से निकलकर जेपी दो दिन के बाद बनारस पहुंचे और बीएचयू में रुके । यहां गोपनीय तरीके से काम करने वाले क्रांतिकारियों से संपर्क किया । सबमें नई जान आ गई । जेपी को अब गुरिल्ला स्वयंसेवकों की आवश्यकता थी , जो अंग्रेजी हुकूमत के दस्तों पर छापा मारकर अपना कब्जा बनाए रखें । इसका नाम आजाद हुकूमत रखा गया । अपना ब्राडकास्टिंग स्टेशन भी कायम किया गया । इसके संचालक राम मनोहर लोहिया थे ।

जेपी पर यातना से जर्रा - जर्रा कांप उठा

 अपनी योजना के अनुसार जेपी फ्रंटियर मेल से रावलपिंडी जा रहे थे । उन्हें कश्मीर जाकर पठानों से संपर्क करके उत्तर - पश्चिम में नई क्रांति का मोर्चा खोलना था । इस बात की भनक अंग्रेजों को लग गई । वे ट्रेन में घुसे और जयप्रकाश नारायण से टिकट मांगने लगे । रेलवे अफसर ने कहा- आप जयप्रकाश नारायण हैं ? जेपी ने कहा- नहीं , मेरा नाम एसपी मेहता है । इतने में उस अफसर ने जेपी पर अपना रिवाल्वर तान दिया । जयप्रकाश समझ गए कि अब खेल खत्म हो गया । लाहौर पहुंचने पर उनके हाथ में हथकड़ी डाल दी गई । एक माह तक किले की काल कोठरी में रखा गया । 20 अक्टूबर , 1943 से जयप्रकाश को यातनाएं दी जाने लगीं । योजना के संबंध में उनसे अंग्रेज जानना चाहते थे , पर जेपी ने मुंह नहीं खोला । कुर्सी में बांधकर भी पीटा , लेकिन भारत के इस सपूत ने यह सिद्ध कर दिया कि तुम चाहे जितनी भी यातनाएं दे लो मुझसे कुछ भी हासिल नहीं होगा । उनका योगदान स्मरणीय है।

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