अस्पृश्य समाज की शिक्षा
"शिक्षा के बिना..... शूद्रों का विनाश हो जाता है"
"शिक्षा के अभाव में ज्ञान का लोप हो जाता है, ज्ञान के अभाव में विकास का लोप हो जाता है, विकास के अभाव में धन का लोप हो जाता है, धन के अभाव में शूद्रों का विनाश हो जाता है।
डॉक्टर अंबेडकर की शिक्षा और डिग्रियां
कोलंबिया विश्वविद्यालय से कला निष्णात और अर्थशास्त्र वाचस्पति की उपाधि;लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस से अर्थशास्त्र में विज्ञान निष्णात और विज्ञान वाचस्पति ; लंदन के ग्रेज़ इन से बैरिस्टर एट - लॉ - किसी भी व्यक्ति के लिए इतनी सारी उपाधियां प्राप्त करना बड़ी उपलब्धि है । परंतु उन्नीसवीं सदी के अंतिम दौर में भारत जैसे औपनिवेशिक देश के एक छोटे से ग्रामीण कस्बे में पैदा होने वाले एक अछूत व्यक्ति के लिए यह सब हासिल कर लेना और भी बड़ी उपलब्धि है । इस उच्च शिक्षा के कारण ही भीमराव रामजी अंबेडकर को भारत में बढ़ते दलित आंदोलन को नेतृत्व प्रदान करने में सहयोग मिला । उनकी सफलता में अनेक कारणों का सुसंयोग रहा जिनमें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन द्वारा गतिशीलता का खोला जाना , कतिपय तरक्की पसंद , दूरदर्शी , धनाढ्य तथा उच्च जाति के सामाजिक सुधारकों की मदद , उनके परिवार के सदस्यों का त्यागपरक सहयोग तथा उनकी स्वयं की सहिष्णुता तथा दृढ़ - निश्चय शामिल हैं। उनकी सफलता का प्रमुख स्रोत उनका परिवार ही था ।
बाबा साहेब आंबेडकर का जन्म और उनका बचपन,महार जाति (लड़ाकू जाति )
अंबेडकर जन्म मध्य भारत के एक छोटे से शहर मऊ में एक अछूत परिवार में 14 अप्रैल 1891 को हुआ था । उनके परिवार का सैन्य - सेवा से संबंध था । वे महार जाति के सदस्य थे । महार जाति भारत की अधिसंख्य अछूत जातियों में शामिल है । महाराष्ट्र में इनकी संख्या सबसे अधिक है और इस संदर्भ में वहां एक प्रचलित कहावत है - ' जहां भी गांव है वहां महरवाड़ा है ' । ' महार ' गांवों में नौकर का काम करते थे जो प्रायः गांव के प्रमुख लोगों , राजनीति से जुड़े उच्च लोगों तथा दबदबे वाले लोगों की सेवा करते थे । सेवा के एवज़ में उन्हें छोटे भूखंड मिलते थे । वे कृषक मज़दूर के रूप में भी काम किया करते थे । राज्य के कुछ हिस्सों विशेषकर पूर्वी महाराष्ट्र में कुछ महारों के पास अच्छी खासी भूमि थी , कई तो धनी कृषक बन चुके थे और कइयों की ज़मींदारी भी थी । बंबई तथा नागपुर दोनों स्थानों पर उपनिवेशवाद की अवधि के दौरान कपड़ा मिलों में महार जाति के कामगारों का अनुपात अत्यधिक था ( बंबई में लगभग 20 प्रतिशत तथा नागपुर में लगभग 40 प्रतिशत ) । महाराष्ट्र में सोलहवीं तथा सत्रहवीं सदी से ही दलितों के सेना में जाने की परंपरा रही है । महार तथा मांग ( उस क्षेत्र की एक अन्य अधिसंख्य अछूत जाति ) भारत की लड़ाकू जातियां रही हैं जो सेना में सिपाही अथवा कहीं - कहीं स्क्वाड्रन लीडर के रूप में कार्य करती रही हैं । कहीं - कहीं उन्हें किलों अथवा गार्ड - पोस्टों का प्रमुख बना दिया जाता था । आठवीं तथा नौवीं सदी के शुरुआती दौर के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा अछूत समुदाय के इन लोगों की भारतीय सेना में अधिक से अधिक संख्या में नियुक्ति की गई जिससे इन लोगों को जीवन के एक नए स्तर का पता चला । अंबेडकर के दादा मलोजी सैन्य सेवा में थे और अंबेडकर के पिता रामजी ( जिनका जन्म 1848 में हुआ था ) , मऊ सैनिक स्कूल के प्रभारी सूबेदार मेजर थे । 1893 में सेना में अछूतों की भर्ती बंद कर दी गई । अछूतों को ' लड़ाकू जाति ' का दर्जा नहीं दिया जा सकता । इस सिद्धांत से जाति - जागरूकता को और हवा मिली । इस समय तक परिवर्तन का बीज बोया जा चुका था । महार जाति की धार्मिक - सांस्कृतिक परंपराएं थीं जिनके कारण वे लोग ग्रामीण समुदायों की परंपराओं से व्यापक रूप से जुड़े थे । शायद यही कारण था कि उनमें समानता तथा स्वतंत्रता की अपेक्षाएं बलवती रूप से प्रकट हुईं । उनमें से कुछ वरकारी थे जो विथोबा संप्रदाय के अनुयायी थे । यह संप्रदाय महाराष्ट्र के मुख्य भक्ति आंदोलन का संवाहक था । कुछ महार महानुभाव थे । यह संप्रदाय और भी पुराने समतावादी आंदोलन का हिस्सा था । इस जाति के कुछ लोग घुमक्कड़ भिक्षु थे और देश में मिलने वाली ब्राह्मणिक , गैर - ब्राह्मणिक एवं मुस्लिम परंपराओं को मिला जुला उच्चारण किया करते थे । रामजी कबीर के अनुयायी थे और कबीर पंथ की पूजा - प्रार्थना व अनुष्ठानों का पालन करते थे । वे शाकाहारी थे और मदिरा - धूम्रपान से परहेज करते थे । अंबेडकर के एक चाचा संन्यासी थे और गोसावी पंथ को मानने वाले थे । 1879 में उनकी अंबेडकर के माता - पिता से अकस्मात भेंट हुई और तब उन्होंने कहा था कि उनके परिवार में एक महान व्यक्ति पैदा होगा जो दबे - कुचले लोगों का दुख - दर्द दूर करेगा । रामजी और उनकी पत्नी भीमाबाई की चौदह संतान हुईं । उनमें से सात की मृत्यु शैशवावस्था में ही हो गई । यह उस समय के लिए आम बात थी । भीम चौदहवां बालक था जिन्हें भीवा भी पुकारा जाता था । शुरू से ही वे महान बालक के रूप में देखे जाने लगे । वे लाड़ प्यार में बिगड़े बालक थे । वे जैसे - जैसे बड़े हुए उनकी छवि ज़िद्दी व लड़ाकू बालक के रूप में बन गई जो अक्सर अपने सहपाठियों से लड़ते रहते थे । किसी भी खेल में उन्हें हारना गवारा न था । उनकी ज़िद की यह आदत आजीवन बनी रही । हालांकि उनका व्यवहार प्रायः संयमित होता था , फिर भी वे कई बार भावना के अतिरेक में भी बह जाते थे । उनकी पहल जीत के लिए ही होती थी ।
भीवा के जन्म के कुछ समय पश्चात ही उनका परिवार रत्नागिरि जिले के डपोली स्थान पर रहने लगा और 1894 में सतारा में बस गया जहां रामजी को लोक निर्माण विभाग में स्टोरकीपर के पद पर नियुक्त किया गया । वहीं उनके सबसे छोटे बेटे ने एक कैंप स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा शुरू की और वर्ष 1900 में अंग्रेज़ी माध्यम के सरकारी हाई स्कूल में पहली कक्षा में दाख़िला पाया । इस स्कूल में उनका भीवा रामजी अंबेडकर के नाम से दाखिला हुआ । उनके नामकरण के पीछे भी एक कहानी उनका परिवार संकपाल था , लेकिन रामजी ने निम्न जाति को दर्शाने वाले उपनाम के स्थान पर पुश्तैनी गांव के नाम का प्रयोग करने का निर्णय लिया । महाराष्ट्र में यह एक आम प्रथा है जहां ' कर ' से समाप्त होने वाला सभी नाम स्थान - सूचक होते हैं । उनके गांव का नाम अंबावाडे था और इस प्रकार उनका नाम अंबावाडेकर होना चाहिए था । कैंप स्कूल में उनका शिक्षक एक ब्राह्मण था जिसका नाम अंबेडकर था । उक्त शिक्षक का ध्यान अध्यापन कार्य में कम और अपने घर की दुकान चलाने में अधिक रहता था , फिर भी वह बच्चों में पूरी रुचि लेता था । तेज़ बालक भीवा उसका प्रिय शिष्य था । भीवा को वह रोज भोजन कराता था ताकि उसे मध्याह्न भोजन के लिए दूर तक अपने घर आना - जाना न पड़े । उसी शिक्षक के सम्मान में बालक का नाम अंबेडकर पड़ गया । बाद के वर्षों में जब अंबेडकर गोलमेज़ सम्मेलन के शिष्टमंडल के सदस्य बनाए गए , उस मौके पर उक्त शिक्षक महोदय ने अंबेडकर को एक भावपूर्ण पत्र लिखा । 1927 में जब अंबेडकर की उस शिक्षक से भेंट हुई तो उन्हें गुरु के रूप में सम्मानित किया । इस प्रकार आधुनिक भारतीय इतिहास का यह लोकप्रिय नाम एक ऐसे शिक्षक के नाम पर पड़ा जो शिक्षण कार्य की दक्षता के लिए तो नहीं जाना जाता था लेकिन वह एक नेक इंसान था ।
शिक्षा के दौरान आई मुसीबतें
वास्तविकता यही है कि भीवा की शिक्षा का श्रेय किसी शिक्षक को न जाकर उनके पिता को जाता है । मैं बी.ए. पास कर लूं इसके लिए मेरे पिता बहुत परेशान रहते थे । सूर्योदय के पहले का समय अध्ययन के लिए उपयुक्त था क्योंकि उस समय मन शांत और अनुशासित होता है । परीक्षा के दिनों में मेरे पिता मुझे सुबह 2 बजे ( खैरमोडे , 1968 , 1:59 ) उठा देते थे । ' रामजी स्वयं अंग्रेज़ी , मराठी तथा मोड़ी भाषाएं लिख लेते थे और उन्हें यह चिंता रहती थी कि उनका पुत्र न केवल उत्तीर्ण हो बल्कि अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो । भीवा शुरू में परीक्षा के प्रति लापरवाह थे और पढ़ाई की उपेक्षा करते थे । लेकिन 1904 में जब उनका परिवार बंबई चला आया तब उनका रुझान अध्ययन की ओर हो गया क्योंकि वहां उन्हें पढ़ने के लिए सभी प्रकार की पुस्तकें उपलब्ध थीं । रामजी पुत्र भीवा को प्रोत्साहित करते रहते थे और जिस किसी पुस्तक की उसे ज़रूरत होती उसे अपनी पेंशन राशि से खरीदने में कोताही नहीं बरतते थे । पेंशन की लघु राशि समाप्त हो जाने की स्थिति में वे अपनी बहन के पास पहुंच जाते थे और उससे गहने मांग कर और फिर उन्हें गिरवी रखकर पुस्तकें खरीदते थे । पेंशन की अगली किस्त आने पर वे गिरवी के गहने छुड़ाते और बहन को वापस कर देते । भीवा और उसके भाई शुरू में जब तक सैनिक आवास में रहे तब तक उन्हें कभी अस्पृश्यता का अनुभव नहीं हुआ । लेकिन सतारा आने पर उन्हें जाति - आधारित भेदभाव का शिकार होना पड़ा । भीवा और एक अन्य अछूत विद्यार्थी को कक्षा में अलग बैठना पड़ता था । कोई भी नाई उनके बाल काटने को राजी न था । जब उन्होंने संस्कृत पढ़नी चाही तो उन्हें पता चला कि यह अछूतों के लिए प्रतिबंधित है । वे केवल अंग्रेज़ी तथा फ़ारसी में से एक का चयन कर सकते थे । वर्ष 1904 में रामजी की नौकरी पूरी हो गई और तत्पश्चात वे बंबई आ गए । पेंशन की राशि से अपने दोनों लड़कों को स्कूली शिक्षा दे पाना उनके लिए संभव नहीं था । अंततः उनके बड़े लड़के बलराम ने एक फैक्ट्री में नौकरी करनी शुरू कर दी । भीवा ने ' एलफिंस्टन हाई स्कूल में शिक्षा जारी रखी । वहां उन्हें फ़ीस में रियायत मिलती थी । स्कूल में उनका कोई मित्र न था और अधिकांश शिक्षक भीवा की उपेक्षा करते थे । इसी वजह से बालक भीवा का अधिकांश समय पास के बगीचे में पढ़ने में बीतता था । इसका एक फ़ायदा यह हुआ कि विल्सन हाई स्कूल के तत्कालीन प्रिंसीपल कृष्ण अर्जुन राव केलुस्कर का ध्यान इस पढ़ाकू विद्यार्थी की ओर गया । केलुस्कर एक सुधारवादी विद्वान थे । वे स्वयं उस गार्डन में जाया करते थे जहां भीवा अध्ययनरत रहा करते थे । केलुस्कर ने अपना परिचय दिया और फिर काफ़ी समय तक भीवा को प्रोत्साहित करते रहे और उन्हें हर प्रकार का समर्थन दिया । वर्ष 1905 में चौदह वर्ष की अवस्था में भीवा का विवाह रमाबाई से हुआ । तब रमाबाई की उम्र नौ वर्ष थी । सन् 1912 में उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम यशवंत रखा गया । तत्पश्चात 1913 से 1924 के बीच उनके चार और बच्चे हुए लेकिन केवल यशवंत ही जीवित रह सका । वर्ष 1907 में भीवा ने हाई स्कूल की परीक्षा पास की । किसी भी अछूत के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि थी । इस उपलक्ष्य में एक बधाई बैठक का आयोजन किया गया । बैठक की अध्यक्षता गैर - ब्राह्मण राजनीतिक नेता एस . के . बोले ने की । उक्त बैठक में केलुस्कर भी शामिल हुए । भीवा - परिवार की आर्थिक तंगी को ध्यान में रखते हुए केलुस्कर ने भीवा के लिए बड़ौदा राज्य से वज़ीफे का प्रबंध किया तंब बड़ौदा भारत की बड़ी रियासतों में से एक था । उसके शासक प्रगतिशील मराठा सायाजीराव गायकवाड़ थे । इसी पृष्ठभूमि में अंबेडकर ने एलफिंस्टन कॉलेज में दाखिला लिया और वहां सन् 1913 में अंग्रेज़ी तथा फ़ारसी में बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की । वहां भी उनका अपने सहपाठियों से बहुत कम ही संपर्क था । इसी दौरान बचपन से चला आ रहा उनका नाम बदल गया और कॉलेज की वार्षिक पुस्तक में उनका भीम नाम दर्ज किया गया ।
जनवरी 1913 में अंबेडकर ने बड़ौदा में नौकरी करने का निश्चय रहे । किया ताकि महाराजा के ऋण को उतार सकें । इस बात को लेकर उनका पिता से विवाद हो गया क्योंकि पिता यह चाहते थे कि उनका पुत्र बंबई के खुले वातावरण में रहे । अंबेडकर अपनी ज़िद पर अड़े हालांकि बड़ौदा पहुंचने पर उन्हें लगा कि उनके पिता का कहना सही था क्योंकि गुजरात में जातिगत भेदभाव कहीं अधिक था । उन्हें रहने के लिए कहीं भी आवास नहीं मिला । केवल सोने मात्र के लिए आर्य समाज कार्यालय में व्यवस्था हो गई । भोजन के लिए उन्हें शहर से दूर बसे अछूतों के मोहल्ले तक जाना पड़ता था । उनके लिए कोई उपयुक्त रोज़गार भी न था । कोई भी विभाग उन्हें नियुक्त नहीं करना चाहता था । उन्हें कोई भी स्थायी काम नहीं मिल सका ।
अंबेडकर के न्यूयॉर्क का सफर
अंततः अपने पिता के देहांत का समाचार पाकर वे बंबई वापस लौट आए । बड़ौदा लौटने के बजाय उन्होंने महाराजा से बंबई में रहने की विनती की । महाराजा ने उन्हें छात्रवृत्ति देकर न्यूयार्क सिटी में स्थित कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अध्ययन हेतु जाने का प्रस्ताव दिया । महाराजा ने अनेक विद्यार्थियों को वहां पढ़ाई के लिए प्रायोजित करने का निर्णय लिया था । चूंकि अंबेडकर की अंग्रेज़ी उत्तम कोटि की थी अतः उनका भी विदेश में अध्ययन के लिए चयन हो गया । जुलाई 1913 में भीमराव दुनिया के प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्र में उच्च शिक्षा के लिए निकल पड़े । दस - बारह सदस्यों के परिवार को वे अपने भाई बलराम के भरोसे छोड़ गए , जो एक मजदूर का काम करता था । भीमराव ने न्यूयॉर्क का माहौल बिल्कुल खुला पाया । अमेरिकियों और वहां रहने वाले भारतीयों के लिए छुआछूत का कोई मतलब न था । वहां उन्हें सहपाठियों से सुखद सहचर्य का आनंद मिला । अंबेडकर इस माहौल से अभिभूत थे । उनका दिन नाटक देखने , बैडमिंटन जैसा खेल खेलने तथा आइस स्केटिंग जैसा नया खेल सीखने में गुज़रता था । सहसा उन्हें ज़िम्मेदारी का बोध हुआ और वे अध्ययन में लग गए । खाली समय में वे अत्यधिक पढ़ाई करते थे और पुरानी किताबों की दुकानों में पुस्तकें ढूंढ़ते । कोलंबिया में उन्होंने सामाजिक विज्ञान और मुख्य रूप से अर्थशास्त्र का अध्ययन किया । वे अमेरिका के सर्वाधिक ख्याति प्राप्त दार्शनिक जॉन • डियू के शिष्य थे । लेकिन उन्होंने अपना एम.ए. अर्थशास्त्र के प्रोफेसर एडवर्ड सैलिग्मैन के निर्देशन में 1915 में किया । उन्होंने पी - एच.डी . के लिए अपना शोध पत्र 1916 में प्रस्तुत किया । हुआ । न्यूयॉर्क में उनका संपर्क प्रसिद्ध भारतीय राष्ट्रवादी नेता से वे नेता लाला लाजपत राय थे । लाला लाजपत राय जी इंडियन होम रूल लीग की ओर से संयुक्त राज्य अमेरिका का दौरा कर रहे थे और उनका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लोगों का समर्थन प्राप्त करना था । अंबेडकर ने लाजपत राय के संगठन द्वारा आयोजित अनेक बैठकों में हिस्सा लिया और संस्था के सदस्यों से उनके दोस्ताना संबंध हो गए । अंबेडकर उन लोगों से जाति - पांति की समस्या पर वाद - विवाद करते थे । उन्होंने लाजपतराय से बहस की कि भारत का राष्ट्रीय आंदोलन छुआछूत जैसे विषयों की अनदेखी कर रहा है । लाजपतराय का कहना था कि एक बार स्वतंत्रता मिल जाए फिर इन विषयों का ठोस निदान निकाला जा सकता है । लेकिन अंबेडकर इससे कतई सहमत न थे । हालांकि अंबेडकर तथा लाजपत राय मित्र तो बने रहे किंतु अंबेडकर ने उनकी संस्था की गतिविधियों में हिस्सा लेना बंद कर दिया ।
अंबेडकर | लंदन | बैरिस्टर और उनके मुसीबतें
1916 में कोलंबिया में डिग्री की पढ़ाई समाप्त होने पर अंबेडकर ने लंदन जाने का निश्चय किया । वे बैरिस्टर बनना चाहते थे , जो आर्थिक स्वावलंबन के लिए ज़रूरी था । चूंकि उनकी छात्रवृत्ति शैक्षिक थी इसलिए वे वहां अर्थशास्त्र में भी डिग्री हासिल करना चाहते थे । बड़ौदा से मिलने वाली छात्रवृत्ति की अवधि समाप्त हो चुकी थी और बड़ौदा के दीवान ने छात्रवृत्ति की अवधि दो साल के लिए और बढ़ाने से मना कर दिया था । ऐसे में अंबेडकर ने महाराजा से निजी तौर पर अनुरोध किया । महाराजा की ओर से उत्तर का इंतज़ार किए बिना ही वे लंदन के लिए रवाना हो गए और लंदन पहुंच भी गए । पैसे बिल्कुल खत्म हो चुके थे , ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करने के अलावा दूसरा कोई चारा न था । वहां जिन लोगों के साथ उन्हें रहना या उन्हीं से मालभाड़ा चुकता करने का अनुरोध किया । दो दिनों बाद महाराजा की ओर से पत्र आया , उन्हें एक साल और छात्रवृत्ति देने की मंजूरी मिली थी । बैरिस्टर - एट - लॉ डिग्री के लिए उन्होंने ' ग्रेज़ इन ' में पंजीकरण कराया और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस में एम.एस.सी. ( इकोनॉमिक्स ) तथा डॉक्टरेट इन इकोनॉमिक्स के लिए दाखिला लिया । एक साल के भीतर ही उन्होंने ' दि प्रोविंशियल डीसेंट्रलाइज़ेशन ऑफ इंडियन फाइनांस ' विषयक शोध - प्रबंध का प्रारूप तैयार कर लिया । किंतु उनकी छात्रवृत्ति की अवधि बढ़ाए जाने की मनाही हो गई । वे भारत लौट आने को मजबूर हो गए । अध्ययन जारी रखने की महत्वाकांक्षा को गरीबी ने ग्रसित कर लिया । हालांकि विदेश प्रवास के दौरान उन्होंने प्रकाशन योग्य दो आलेख तैयार कर लिए थे । उनमें से एक लेख - जिसका शीर्षक ' कास्ट्स इन इंडिया : देयर मैकेनिज़्म , जिनेसिस एंड डेवलपमेंट ' था । यह कोलंबिया विश्वविद्यालय की गोष्ठी के लिए 1916 में लिखा गया था और ' द जर्नल ऑफ़ इंडियन एंटीक्विटी ' में प्रकाशित हुआ । अर्थशास्त्र में पी - एच . डी . के लिए किया गया कार्य एक वृहत कार्य था । यह 1927 में ' द इवोल्युशन ऑफ़ प्रोविंशियल फाइनांस इन ब्रिटिश इंडिया ' शीर्षक से प्रकाशित हुआ । छात्रवृत्ति की एवज़ में अंबेडकर ने बड़ौदा राज्य की एक निश्चित अवधि तक सेवा करने का अनुबंध किया था । उन्होंने बड़ौदा राज्य की सेवा शुरू कर दी । उन्हें पुनः जाति - पांति की चरम अवस्था का सामना करना पड़ा । उन्हें रहने के लिए पारसी आवास परिसर में क्वार्टर मिला , लेकिन वहां रहने के लिए उन्हें पारसी नाम धारण करना पड़ा । काम - काज की स्थिति भी बेहतर न थी । ब्राह्मण जाति के क्लर्क तथा दूसरे अधीनस्थ कर्मचारी अभद्र भाषा का प्रयोग करते थे , और अंबेडकर के खिलाफ खुल्लम - खुल्ला बोलते थे । वे अंबेडकर से दूरी बना कर रखते थे , और कागज़ात को उनकी मेज़ पर फेंक कर दिया करते थे ,ताकि उनके संपर्क से बचा जा सके । जब उन्होंने अफसरों के क्लब में शामिल होना चाहा तो वहां उपस्थित दूसरे अफ़सर उन्हें दूर कोने में बैठने को कहते और किसी भी खेल में भाग लेने से मना करते थे । उन्हें अपने काम से भी कोई संतुष्टि नहीं होती थी । उन्हें बड़ौदा शासक का ' मिलिट्री सेक्रेटरी ' नियुक्त किया गया था , लेकिन उनके लिए काम का स्पष्ट रूप से बंटवारा नहीं किया गया था । उन्हें झिड़कियों और प्रतिरोध का सामना करना पड़ता था , लेकिन पराजित महसूस न करने का वही स्वभाव उनमें अब भी बना हुआ था जो बालक भीवा में था । बड़ौदा के प्रतिकूल माहौल में उन्हें कोई मित्र न मिल सका । इसलिए उन्होंने अपना समय ग्रंथालय में सामाजिक , आर्थिक तथा राजनीतिक विषयों की पुस्तकें पढ़ने में बिताया । स्थिति की भयंकरता तब चरम सीमा पर पहुंच गई जब पारसियों को उनकी जाति का पता लग गया । पारसियों के एक क्रुद्ध दल ने उनके आवास को चारों तरफ से घेर लिया , वे उन्हें मारने पर आमादा थे । घर के मालिक ने अंबेडकर को तत्काल अपने घर से निकाल दिया । अंततः 17 नवंबर 1917 को उन्होंने राज्य छोड़ दिया । अब उनके समक्ष आजीविका का प्रश्न था । सरकारी महकमों में आवेदन का कोई जवाब न मिलता था ; इतने पढ़े - लिखे अछूत स्नातक को नौकरी देने की चिंता कौन करे ? निश्चित ही इसमें उन्हें राष्ट्रीय सहानुभूति मिलने का डर देखा जा सकता है । निजी कंपनियों में नौकरी के लिए प्रयास का भी कोई फल न निकला । लेखन से जीविका चला पाने की उम्मीद अव्यावहारिक सिद्ध हुई । अंत में उन्हें सिर्देहम कॉलेज में राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफ़ेसर के रूप में दो वर्षों के लिए नियुक्ति मिली । वे उस पद पर 11 नवम्बर 1918 से 11 मार्च 1920 तक बने रहे । अपनी कमाई से 7000 रुपए बचा कर तथा कोल्हापुर के महाराजा से प्राप्त 1500 रुपए की उपहार राशि की मदद से वे पुनः लंदन रवाना हो गए ताकि डॉक्टरेट की डिग्री की सारी औपचारिकताओं को पूरा कर सकें । कम पैसे लेकिन पक्के इरादों की बदौलत अंबेडकर तीन साल तक लंदन में रहे । लंदन प्रवास की उनकी यह अवधि संयम से भरी थी । छात्रावास में रहना , सुबह 6 बजे उठ जाना और फ़टाफ़ट तैयार होकर ग्रंथालय पहुंचना और उसके खुलने से लेकर बंद होने तक वहीं बैठे रहना और पुस्तकों में डूबे रहना उनकी दिनचर्या थी । जहां भारतीय विद्यार्थी नाटक देखने व घर की जिम्मेदारियों से मुक्ति का आनंद लेने में मशगूल रहते थे वहीं अंबेडकर ने अध्ययन के प्रति पूरी गंभीरता का परिचय दिया । इसी दौरान युवा अंबेडकर को दो नए अनुभव हुए एक भावनात्मक व व्यक्तिगत था , तथा दूसरा राष्ट्रवादी व राजनीतिक था । दूसरी मकान मालकिन की पुत्री फ़ैनी फिट्ज़ेराल्ड से उनकी अंतरंगता बढ़ी । वह ' इंडिया - ऑफ़िस ' में कार्यरत थी जहां वह विभिन्न विषयों पर अंबेडकर के लिए सामग्री एकत्र करती थी । शायद वह उन्हें कुछ आर्थिक मदद भी करती थी । वे जब भारत लौट आए तब उनकी पुस्तकों को उसी ने संभाल कर रखा । फ़ैनी के प्रति अंबेडकर के भाव कहीं परिलक्षित नहीं हुए हैं , लेकिन यह स्पष्ट है कि फ़ैनी उनसे प्यार करती थी । बाद के दिनों में अंबेडकर ने उसके लिए ' एफ ' उल्लेख किया । 1930 के मध्य के दौरान अंबेडकर की पत्नी की मृत्यु के पश्चात फ़ैनी ने उम्मीद जताई कि वे उससे शादी करेंगे । एक भारतीय समाचार पत्र ने 1935 में रिपोर्ट प्रकाशित की जिसके अनुसार अंबेडकर ने लंदन प्रवास के दौरान एक अंग्रेज़ विधवा से शादी कर ली थी । बाद में अंबेडकर ने इस संबंध के बारे में विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके जीवन में महिलाओं की कोई भूमिका नहीं है ( उन्होंने दो के नाम का उल्लेख किया जिसमें से एक नागपुर की महार जाति की फल बेचने वाली थी और दूसरी अंग्रेज़ी विषय की एक भारतीय शिक्षिका थी ) और उन्होंने कहा कि इन महिलाओं से उनके भावनात्मक लगाव के लिए उन्हें खेद है । इंग्लैंड में उन्होंने दावा किया था कि उनका समय अध्ययन के लिए था ताकि वे भारतीय राष्ट्रवाद से जुड़े महान नेताओं से वाद - विवाद में सामना करने के लिए अपने को तैयार कर सकें । फिर भी उनका आपसी पत्राचार लगभग पच्चीस सालों तक चलता रहा ( खैरमोडे , एन.डी. 2 : 65-67 ; 1998 बी : 7 : 53-59 ) । वे भारतीय विद्यार्थी आंदोलन में हिस्सा लेने लगे जिसने बाद में राजनीतिक आंदोलन का रूप से लिया । उन्होंने विद्यार्थी संघ की गतिविधियों में भी भाग लेना शुरू कर दिया जिनमें विभिन्न विद्यार्थियों द्वारा लेख पढ़े जाते थे । अंबेडकर के लेख ' रिस्पांसिबिलिटीज़ ऑफ़ ए रिप्रेजेंटेटिव गवर्नमेंट इन इंडिया ' ने तीखा वाद - विवाद शुरू कर दिया । अंततः राजनीति शास्त्र के प्रसिद्ध विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर हेराल्ड लास्की के हस्तक्षेप के बाद ही विवाद थम पाया । प्रोफेसर हेराल्ड ने टिप्पणी दी कि अंबेडकर के उक्त लेख में क्रांतिकारी राजनीति के तत्व विद्यमान हैं और इसी कारण यह विद्यार्थियों के समूह के लिए उपयुक्त नहीं है । उसी के बाद विद्यार्थियों के बीच भीमराव की छवि क्रांतिकारी विचारक की बन गई । यहां तक की रूसी क्रांति के प्रचारक भी अंबेडकर के निकट संपर्क से परहेज़ करने लगे । अलग - थलग पड़े अंबेडकर ने पुनः पुस्तकों में गहरी रुचि लेनी शुरू कर दी और अपना समय पुस्तक भंडारों एवं ग्रंथालयों में व्यतीत करने लगे । वे निजी पुस्तकालय स्थापित करना चाहते थे , ठीक उसी तरह का जैसा उन्होंने न्यूयॉर्क में देखा था । वहां उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के भारतीय अर्थव्यवस्था संबंधी 1700 से 1858 तक के वार्षिक प्रतिवेदनों का संग्रह किया था । इसके परिणामस्वरूप 1921 के मध्य तक वे भारी वित्तीय कठिनाइयों में फंस गए । शायद उसी दौरान फैंसी फिट्ज़गेराल्ड ने अंबेडकर को महत्वपूर्ण सहायता प्रदान की । ऐसे किसी अन्य स्रोत का कोई उल्लेख नहीं मिलता जहां से उन्हें मदद मिली हो । उनका डॉक्टरेट का शोध - प्रबंध भी विवाद के घेरे में आ गया । सत्रह महीने बाद जून 1921 में उनका एम.एस.सी. का शोध - प्रबंध स्वीकार कर लिया गया । उसके बाद उन्होंने ' द प्रॉब्लम ऑफ़ द रुपी ' विषय पर डॉक्टरेट की डिग्री के लिए अपना शोध - प्रबंध प्रस्तुत किया । इसकी स्वीकृति में चार अथवा पांच महीने लगने की उम्मीद थी ।
इस अवधि में उन्होंने जर्मन भाषा में डिग्री हासिल करने का निर्णय लिया । दरअसल उन्होंने जर्मन तथा फ्रेंच दोनों का ही अध्ययन शुरू कर दिया । बॉन विश्वविद्यालय से स्वीकृति मिलते ही अंबेडकर जर्मनी के लिए रवाना हो गए । इसी बीच 1923 के मध्य में सुपरवाइज़र प्रोफ़ेसर एडविन कैनन का संदेश आया कि लंदन के परीक्षकों ने उनके डॉक्टरेट शोध - प्रबंध को स्वीकृति प्रदान करने से मना कर दिया है । इसका कारण राजनीतिक था । अंबेडकर ने ब्रिटिश नीति की अत्यधिक आलोचना की थी , साथ ही अंतरराष्ट्रीय आचार - विचार की स्थापित नीति से भी उनके विचार मेल नहीं खाते थे । अंततः उन्हें अपने शोध - प्रबंध के निष्कर्ष में संशोधन के लिए सहमत होना पड़ा । वे अप्रैल 1923 में बंबई लौट आए । उन्होंने संशोधित शोध प्रबंध नवंबर 1928 में भेजा । बाद में उन्हें टेलीग्राम से डिग्री प्रदान कर दिए जाने की सूचना मिली । घर लौटने के बाद अंबेडकर के सामने गृहस्थी की समस्या थी जिसमें पत्नी , बच्चे , भाभी तथा भतीजे की देखभाल करना शामिल था । वे वकालत शुरू करना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने 1924 में बंबई हाईकोर्ट में पंजीकरण कराया । कोर्ट के आस - पास दफ्तर खोल पाना उनके बूते से बाहर था , अंततोगत्वा मित्रों के योगदान से उन्होंने परेल में दामोदर हॉल में अपना दफ्तर स्थापित किया । मुकद्दमा मिलने में महीनों लग गए , अंत में एक महार का मुक़द्दमा मिला । बाद में रोचक बात यह रही कि उन्हें लोकमान्य तिलक के भतीजे से काम के रूप में कुछ सहायता मिली । हिंदू जाति के लोग उन्हें मुकद्दमा सौंपने से परहेज़ करते थे । भारत के आर्थिक इतिहास पर पुस्तकें लिखने की उनकी महत्वाकांक्षी योजना को भी कहीं से मदद नहीं मिल पा रही थी । अंत में उन्हें बॉटलीबोई एकाउंटेंसी इंस्टिट्यूट में अल्पकालिक शिक्षक के रूप में कमर्शियल लॉ पढ़ाने का काम मिला । साथ ही बंबई विश्वविद्यालय में परीक्षा की कॉपी जांचने से भी कुछ अतिरिक्त आय की व्यवस्था हुई । पुस्तकें खरीदने की उनकी आदत बनी हुई थी जिससे उनकी आय पर बोझ पड़ता था और परिवार चलाने के लिए संघर्ष करती उनकी पत्नी रमाबाई दुखी रहती थीं । फिर भी कार्यालय , ग्रंथालय स्थापित होने और महारों और अन्य मित्रों की भीड़ से उनके जीवन में रौनक आने लगी ।अंबेडकर को पारिवारिक शोक का सामना करना पड़ा । दरअसल उनके घर तीसरे पुत्र का जन्म हुआ था । अंबेडकर इस पुत्र से जिसका नाम राजरत्न था , भावनात्मक रूप से काफ़ी जुड़ गए थे और अपना समय उसके साथ खेलने में बिताते थे । लेकिन एक वर्ष बाद ही दोहरे न्यूमोनिया के कारण बच्चे की मृत्यु हो गई और माता - पिता को गहरा आघात लगा । अंबेडकर ने बाद में लिखा पुत्र यह बहाना बनाने से कोई फायदा नहीं कि मैं और मेरी पत्नी की मृत्यु के शोक से उबर गए हैं और शायद कभी उबर भी न पाएं । हमारे चार - चार बच्चे - तीन बेटे और एक बेटी कालग्रसित हो चुके हैं । हमारे ये सभी बच्चे कोमल , सुकुमार , शुभ और सुंदर थे ... मेरा अंतिम पुत्र अत्यंत ही विलक्षण था , अद्वितीय था । उसकी मृत्यु के साथ ही मेरा जीवन वीरान हो गया है । ( खैरमोडे , एन . डी . , 2 : 104 )
पुस्तक ' द प्रॉबलम ऑफ़ द रुपी '
आर्थिक विषयों पर अंबेडकर के प्रारंभिक लेखों से पता चलता है कि वे नव - क्लासिकल अर्थशास्त्र के ढांचे के भीतर एक कल्पनाशील एवं सजग विश्लेषक हैं । उनकी पुस्तक ' द प्रॉबलम ऑफ़ द रुपी ' 1923 में इंग्लैंड में उस समय प्रकाशित जब राष्ट्रवादियों तथा ब्रिटिश सरकार के बीच विनिमय दर के बारे में संघर्ष चल रहा था । उनकी पुस्तक में वर्षों से चली आ रही ब्रिटिश मुद्रा नीति की कटु आलोचना की गई । थी । अंबेडकर ने बताया कि खुली अर्थव्यवस्था में भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकता है , उन्होंने यह भी बताया कि रुपए के अवमूल्यन की अवधि के दौरान भारतीय निर्यातकों तथा उत्पादकों को फायदा हुआ है । उनकी दूसरी पुस्तक ' द इवोल्यूशन ऑफ़ प्रोविंशियल फाइनांस इन ब्रिटिश इंडिया ' भी इंग्लैंड में ही 1925 में प्रकाशित हुई । पुस्तक में एक उदार ढांचे के भीतर ब्रिटिश उपनिवेशवाद की आलोचना की गई थी और इसे अमेरिकी लोगों को पेश किया गया था जिन्हें ब्रिटिश नीति पर किसी भी प्रकार के प्रहार से कोई फर्क नहीं पड़ता था । इस पुस्तक में दर्शाया गया है कि ब्रिटिश राजकोषीय नीति के तहत भारत में किस प्रकार अविवेकपूर्ण कर लगाए गए । भूमि - कर ने कृषि उन्नति को बाधित कर दिया था जबकि भारी सीमा शुल्क तथा आंतरिक उत्पाद शुल्क ने औद्योगिक विकास के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया था । यह स्पष्ट था कि ब्रिटिश सरकार की भारत नीति ब्रिटिश उत्पादकों के हितों के लिए लागू की जा रही थी । उन्होंने आगे कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तत्कालीन सरकार सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध कार्यरत नहीं थी । ब्रिटिश सरकार ने ' भारतीय समाज में विद्यमान प्रवृत्तियों , यहां के लोगों की आकांक्षाओं , दुखों , ज़रूरतों , इच्छाओं के प्रति कोई सहानुभूति नहीं रखी , बल्कि उनका व्यवहार प्रतिकूल था ... भारत सरकार ने यहां की जाति व्यवस्था समाप्त करने , एकल विवाह व्यवस्था लागू करने के लिए कुछ नहीं किया , साथ ही उत्तराधिकार कानून को बदलने , अंतरजातीय विवाह को विधि सम्मत बनाने अथवा चाय उत्पादकों पर कर लगाए जाने के लिए भी कुछ नहीं किया । " उन्होंने कहा कि राष्ट्रवादी विद्रोह आर्थिक मुद्दों के आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक कारणों से होता है । सड़कें बनाने तथा नहरें बनाने से कोई फायदा नहीं है , ' लोग ... अंततः अपनी सरकार चाहेंगे जो कार्य कुशलता से कहीं अधिक ज़रूरी है । ' ( अंबेडकर , 1989 , 6 : 233-34 ) । वर्ष 1918 में ' जर्नल ऑफ़ दि इंडियन इकोनॉमी सोसायटी ' में उनके दो लेख प्रकाशित हुए जिनसे उनकी सामाजिक - आर्थिक सोच का पता चलता है । बट्रेंड रसल ने एक पुस्तक की समीक्षा लिखी जिससे जाहिर होता है कि अंबेडकर विकास तथा प्रगति में दृढ़ विश्वास रखते थे । उन्होंने ' शांत ' परंपरागत भारतीय दृष्टिकोण तथा सीमित आवश्यकताओं के सिद्धांत को नकार दिया जिसे बाद में गांधीवाद से जोड़ा गया था । पैसा तथा दुनिया की चीज़ों के प्रति मोह त्यागने के ' नैतिक ' उपदेश पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा , ' ऐसे समय जब पूरी दुनिया अर्थव्यवस्था की तंगी में है ... और जब श्रम उत्पादकता अत्यधिक स्तर पर है ... नैतिकतावादी लोगों के लिए गरीबी तथा दुनिया के को त्यागने की बात कहना स्वाभाविक ही है क्योंकि वे चीजें उपलब्ध ही नहीं हैं । ' ( अंबेडकर , 1979 , 1 : 489-91 ) उनके अनुसार उत्पादन तथा उपभोग विकास की निशानी हैं और इसमें मानव का विकास सन्निहित है । वे इस तर्क से सहमत नहीं थे कि संपत्ति ही बुराई की जड़ है । ' समस्या ... संपत्ति के होने की नहीं है बल्कि उसके असमान वितरण की है । ' ( अंबेडकर , 1979 , 1 : 489-91 ) । दूसरे लेख का विषय था - ' स्मॉल होल्डिंग्स इन इंडिया एंड देयर रेमेडीज् ' । इस लेख में भारतीय कृषि के पिछड़ेपन का उल्लेख है । छोटी जोतों का होना वास्तव में बुरा था- ऐसी उनकी मान्यता थी । हालांकि जोतों का छोटा अथवा बड़ा होना आकार पर निर्भर होने के बजाय उत्पादन के अन्य कारकों के समानुपात पर निर्भर करता था । इस दृष्टिकोण से , वे भारतीय किसान जिनके पास उत्पादन हेतु कम उपकरण ( जैसे हल , गाड़ी तथा बैल ) थे उनकी ज़मीन गैर फ़ायदेमंद थी क्योंकि वे बहुत बड़ी थीं । कृषि उत्पादन कम था , भूमि का बड़ा हिस्सा बेकार पड़ा था और पूरी अर्थव्यवस्था अस्त - व्यस्त थी । उपज पर अत्यधिक निर्भरता बुरी थी और इसका कारण औद्योगीकरण का अभाव था । इसका हल गैर - कृषि उत्पादन , औद्योगीकरण का विकास है और इसी से भारतीय कृषि की समस्याओं का भी समाधान हो सकता है । यह एक गैर - गांधीवादी दृष्टिकोण था और अंबेडकर की सोच के अनुकूल था । अछूतों तथा भारत के सभी ग़रीबों का भविष्य गांवों में निहित होने के बजाय शहरीकृत एवं आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था कायम करने में है । अंबेडकर की औपचारिक शिक्षा समाप्त हो चुकी थी । लेकिन यह ब्राह्मणवादी परंपरा के ' ब्रह्मचारी ' अवधि की अवधारणा से भिन्न थी , जब गुरु से जुड़ जाने पर पूर्णता तथा दुनिया की इच्छाओं से मुक्ति मिलती थी , जहां पारिवारिक जिम्मेदारियां नहीं होती थीं और शिक्षा ग्रहण का कार्य मुक्त तथा शुद्ध वातावरण में होता था । उनकी शिक्षा अवधि कदाचित संघर्षपूर्ण थी और उन्हें अपनी तथा अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए आमदनी का ज़रिया ढूंढना पड़ता था । शिक्षा अवधि के दौरान उन्हें ग़रीबी तथा जातिगत भेदभाव के कटु अनुभव हुए । शिक्षा के महत्व के प्रति उनकी जागरूकता केवल निजी नहीं थी । ज्योतिराव फुले , जिन्हें अंबेडकर ने बाद में अपने गुरुओं में से एक माना , का भी यही विचार था । फुले के अनुसार शिक्षा सीधे विकास व समृद्धि से जुड़ी है । भारत के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने भी बाद में इसी तथ्य को उजागर किया । बंबई , न्यूयॉर्क तथा लंदन में शिक्षा प्राप्त करने के बाद अंबेडकर सीधे विश्व की सामाजिक - आर्थिक चिंतन प्रवृत्ति से जुड़े तत्कालीन राष्ट्रवादी नेताओं में कुछ ही ऐसे लोग थे जिनके पास उनके बराबर डिग्रियां रही हों । उनकी अध्ययन शैली को प्रोमैथियन ( भगीरथ ) संघर्ष से जोड़ा जा सकता है और हम कह सकते हैं कि यह उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि मात्र न होकर भारतीय अछूतों के दमन के विरुद्ध संघर्ष का माध्यम थी । अंबेडकर अपनी सभी मूर्तियों व चित्रों में पश्चिमी पोशाक में दिखते हैं , इसका यही मतलब है कि उन्होंने अपने को विश्व धरोहर से जोड़ा था । अंबेडकर की शिक्षा गरीबी में हुई थी । उनके संघर्ष की कहानी जल्द ही शुरू हो गई थी ।
अंबेडकर के लिए मुश्किलों का सामना करना कितना कठिन था
अंबेडकर और उनके परिवार ने सामान्य भारतीयों के दुख - सुख को भोगा था । उस समय लोगों की औसत आयु बीस से तीस वर्ष के बीच थी । चौदहवें बच्चे को जन्म देते समय मां की मृत्यु ( उनमें से सात बच्चे बच पाए ) , परिवार चलाने के लिए बड़े भाई द्वारा मज़दूर का काम करते हुए मृत्यु , उनके अपने पांच में से चार बच्चों की मृत्यु - इन सबसे केवल बीमारी की अवस्था का ही पता नहीं चलता , बल्कि जीवन स्तर , कुपोषण , कम स्थान में अधिक लोगों का रहना तथा साफ़ - सफाई न होने की स्थिति का भी पता चलता है । यह स्थिति अभिजात्य राष्ट्रवादियों की स्थिति से भिन्न थी । गांधी ने किसी सिद्धांत के तहत ट्रेन की तृतीय श्रेणी में यात्रा की होगी लेकिन अंबेडकर की पैसा यात्रा । मजबूरी थी । नेहरू और उनके साथियों ने सरकारी नौकरी या फिर न्यायालय जैसे सरकारी संगठनों से अपने संबंध इसलिए भी तोड़े होंगे क्योंकि इस बात का भरोसा था कि धनाढ्य लोग उन्हें तथा उनके परिजनों । को आर्थिक सहयोग देते रहेंगे । लेकिन अंबेडकर जैसे नीची जाति के तथा ग़रीब - पृष्ठभूमि के लोगों के लिए जो अपने परिवार को स्वयं अपनी आमदनी से चलाते थे , ऐसा कर पाना संभव नहीं था । उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने से पहले परिवार की आर्थिक स्थिति व आजीविका के बारे में सोचना पड़ता था । हालांकि ' मध्यमवर्गीय ' दलितों की आज भी आलोचना होती है और तत्कालीन वामपंथियों द्वारा अंबेडकर की भी ' तुच्छ बुर्जुआ ' के रूप में आलोचना की जाती थी । लेकिन यह बात तो स्पष्ट ही है कि दलितों के बारे में मध्यम वर्ग की अवधारणा भी भिन्न है । तब जाति भाव प्रमुख था । उपनिवेशवाद के दौरान व्यक्तिगत प्रहारों के बारे में तथा निजी मान - मर्दन व सामाजिक बहिष्कार के बारे में काफ़ी कुछ लिखा गया है । अंबेडकर ने स्वयं भारतीय के रूप में भेदभाव का दंश झेला था । लेकिन अस्पृश्यता के दंश की तुलना में उक्त अनुभव कुछ भी न थे । शायद फ़ौजी परिवार की पृष्ठभूमि होने के कारण उन्हें मनोवैज्ञानिक स्तर पर उतना क्लेश न झेलना पड़ा हो जितना कि अन्य दलितों को झेलना पड़ा था । उनके माता तथा पिता दोनों का ही परिवार फ़ौजी पृष्ठभूमि का था और इसीलिए पारंपरिक ग्रामीण माहौल में नीची जाति के साथ होने वाले मान - मर्दन की स्थिति उनके साथ उत्पन्न नहीं हुई । अंबेडकर के परिवार वालों ने निस्संदेह उनमें आत्मविश्वास और महत्वाकांक्षा का बीज बोया था । लेकिन जब उनका परिवार सतारा आ गया तब उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा । उन लोगों को अलग बैठने के लिए कहा जाता था , वे अपनी इच्छानुसार विषयों का चयन कर अध्ययन नहीं कर सकते थे , अन्य वर्ग के विद्यार्थियों द्वारा उनका बहिष्कार किया जाता था और बड़ौदा जैसे शहर में उन्हें रहने का स्थान नहीं मिल पाया था और ढंग का रोज़गार भी मयस्सर न था । अंबेडकर को यह अहसास हो चला था कि इस प्रकार के जातिगत भेदभाव व्यापक थे , इसमें निजी मान - मर्दन शामिल था । यह स्थिति छोटे से गांव से लेकर शहरी झोंपड़पट्टी और भारत के ऊंचे - से - ऊंचे स्तर तक व्याप्त थी । अस्पृश्यता और इसे संपोषित करने वाला सांस्कृतिक - धार्मिक जीवन पक्ष अंबेडकर के दिलो - दिमाग को आंदोलित कर रहा था - अतः इसे दूर करना उनके जीवन का मूल उद्देश्य बन गया।

