हाल ही में एम.एस. स्वामीनाथन फाउंडेशन नें एक सम्मेलन का आयोजन किया.,जिसका उद्देश्य था वैज्ञानिक शिक्षा पर बातचीत करना और उसकी थीम- "वर्चुअलकंसलटेशन आन साइंस फार रिसाइलेंस, फूड, न्यूट्रीशन एण्ड लाइवलीहूड कंटेंपोरेरी चैलेंजेस" थी। इस थीम पर बातचीत करते हुए इस सम्मेलन में अमेरिकन यूनिर्वसिटी ऑफ कैलीफोर्निया के वैज्ञानिक प्रोफेसर अल्बर्ट, जो प्रसिद्ध पत्रिका -"साइंस" के प्रधान संपादक और "मॉलिक्यूलर बायोलाजी ऑफ दि सेल" पुस्तक के लेखक हैं., जो जीव वीज्ञान स्नातकों के बीच बाइबिल है। उन्होंनें अपने वक्तव्य में कुछ महत्वपूर्ण बातों की तरफ संकेत किया- ये वही बातें हैं जो यह प्रमिणित करती हैं कि नवाचार ही सामाजिक कल्याण और आर्थिक संवृद्धि के लिए सबसे सर्वोत्तमपाय माध्यम हो सकता है। अतः स्वाभाविक रुप से यह कहा जा सकता है कि यदि शिशु को खिलाने वाले हाथ एम. एस. स्वामीनाथन फाउंडेशन और प्रोफेसर अल्बर्ट की तरह सोच रखने वाले होंगे तो स्वाभाविक है, उसका परिणाम व्यक्तिगत के साथ-साथ सामाजिक हित में भी प्रमाण साबित होगा। सम्मेलन के दौरान प्रोफेसर अल्बर्ट नें प्रसिद्ध वैज्ञानिक पियरे होहेनबर्ग की एक संकल्पना का जिक्र किया- विज्ञान s (स्माल एस) है और उस विज्ञान का जो अनुप्रयोग है वह S (कैपिटल एस) है। अर्थात "s" डिस्कवरी या खोज से जुड़ा हुआ है और "S" उस खोज के व्यहारिक उदाहरण से जुड़ा है। ऐसे में यदि इन मूल्यों को हम शिशु को सिखायें तो स्वाभाविक है, वो शिशु न केवल खोज की मानसिकता से संपन्न होगा अपितु वह नवाचार की मानसिकता से भरपूर होगा। ऐसे में यदि नई शिक्षा नीति द्वारा शिशुओं को शिक्षित एवं प्रशिक्षित किया जाए तो यही शिशु आगे चलकर राष्ट्र में नवाचार के विभिन्न आयामों को पूरा करते हुए राष्ट्र के सामाजिक विकास एवं आर्थिक संंवृद्धि को बढ़ाएंगे। अतः स्वाभाविकत: राष्ट्र नवाचार की मानसिकता से भरपूर होगा और विकास की सभी बुलंदियों को बिना रोक-टोक के छूता नजर आयेगा।
निबंध :शिशु को खिलाने वाले हाथ {UPSC Mains essay} भूमिका
byAKASH BIND
•
0