राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019-
प्रस्तावना-
"शिक्षा सर्वशक्तिशाली हतियार है ,जिसे दुनिया को बदलने में इस्तेमाल किया जा सकता है"- नेल्सन मण्डेला
"शिक्षा मानव संसाधन विकास का सार है ,जो देश के आर्थिक,सामाजिक ताने-बाने को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जून 2017 में मानव विकास मंत्रालय द्वारा डॉ के कस्तूरी रंगन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी थी ।समिति नें "शिक्षा नीति 2019" की अपनी रिपोर्ट 30 मई 2019 को सौंपी थी। रिपोर्ट में व्यापक आयामों को शामिल करते हुये एक समग्र शिक्षा नीति तैयार की गयी है। नीति अपनें उद्देश्य में भारत केंद्रित शिक्षा प्रणाली की कल्पना करती है, जो सभी को उच्च गुणवत्ता प्रदान कर हमारे राष्ट्र को लगातार न्याय संगत और जीवंत न्याय समाज में बदलने में योगदान देगी।सरकार नें नीति के प्रारुप को सुझावों के लिए पब्लिक डोमेन में रखा है। प्रारूप के मूल रूप में हिन्दी को सभी राज्यों में त्रिभाषा सूत्र के तहत पढ़ाना अनिवार्य किया गया था। इसके बाद तमिलनाडु के राजनेताओं नें विरोध जताया था। जिसके परिणाम स्वरुप हिन्दी की अनिवार्यता को हटा दिया गया। अब वर्तमान में संशोधित प्रारूप पब्लिक डोमेन में है।
वैश्विक शिक्षा नीति-
यू.एन.ओ. के महासभा द्वारा 1948 में अपनाये गये ऐतिहासिक मानवाधिकार घोसणा पत्र की बात करें तो इसके अनुसार सभी को शिक्षा का अधिकार है। इसके अन्नुछेद 26 में कहा गया है कि कम से कम प्रारंभिक और मौलिक चरणों में शिक्षा निःशुल्क होनी चाहिए। इसके अलावा 21वीं सदी के लिए जैक्स डेलर्स/डीलर्स की अध्यक्षता में अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन किया गया। डीलर्स नें अपनी रिपोर्ट "लर्निंग द् ट्रेजर्स विदिन " नाम से यूनेस्को को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।इसके अनुसार शिक्षा का परिणाम -"मानव का सर्वांगिण विकास होना चाहिए।" सतत् विकास लक्ष्य (लक्ष्य संख्या 4) में सभी के लिए गुणवत्ता परक शिक्षा की बात की गई है।
भारत में शिक्षा नीति-
यदि भारतिय संविधान की बात करें तो इसके अंतर्गत शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। संविधान के अन्नुछेद 21अ में 6-14 वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है। और मौलिक कर्त्तव्य में भी माता-पिता या प्रतिपालकों द्वारा 6-14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान कराने का प्रावधान है। इसे 86वें संविधान संशोधन 2002 के द्वारा 11वां मौलिक कर्त्तव्य के रूप में जोड़ा गया था। नीति निदेशक तत्व में भी अन्नुछेद 45के तहत 6 वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देख-रेख और शिक्षा देने के लिए राज्य उपबंध करेगा
क्या है त्रिभाषा सूत्र-
दरसल त्रिभाषा सूत्र नेशनल पॉलिशी आन एजुकेशन 1968 के तहत लाया गया था। इसके अनुसार राज्यों को द्वितियक स्तर पर त्रिभाषा सूत्र अपनाना चाहिए ओर इसे जोरदार ढंग से लागू भी करना चाहिए। इसमें हिन्दी भाषी राज्यों को अपने यहां हिन्दी और अंग्रेजी के अलावा कोई एक आधूनिक भारतीय भाषा विशेष तौर पर दक्षिणी राज्यों की किसी भांंषा का अध्ययन करवाना चाहिए। वहीं गैर हिन्दी भाषी राज्यों को अपनें यहां हिन्दी और अंग्रेजी के साथ क्षेत्रीय भांषा का भी अध्ययन करवाना चाहिए। "राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019" के प्रारुप में विवाद यह है कि गैर हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी को पढ़ाना अनिवार्य किया गया था। हालांकि ड्राफ्ट में कहा गया था; कि जो 3 भाषाओं को छोड़ना चाहते हैं, वे कक्षा 6 से ऐसा कर सकते हैं। ड्राफ्ट के जारी होने के बाद तमिलनाडु के राजनेताओं द्वारा इस पर कड़ा प्रतिरोध जताया गया। केन्द्र में इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा गया कि यह नीति अभी ड्राफ्ट के तौर पर है और अंतिम रूप से नीति जारी होना अभी बाकी है और किसी भी शिक्षण संस्थान में किसी भी भाषा को न तो थोपा जायेगा और न ही किसी भाषा के साथ भेदभाव किया जायेगा। बहराल इस मुद्दे पर समिति नें ड्राफ्ट से हिन्दी की अनिवार्यता को हटा दिया है।
ऐतिहासिक पहलू-
शिक्षा नीति के प्रमुख प्रावधानों पर चर्चा करने से पहले आपको बता दें कि डॉ के कस्तूरी रंगन समिति के गठन के पहले मानव विकास मंत्रालय द्वारा अक्टूबर 2015 में स्वर्गीय पी एस सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में नयी शिक्षा नीति के विकास के लिए समिति का गठन किया गया था। इस समिति नें मई 2016 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। जिसके आधार पर मंत्रालय नें नयी शिक्षा नीति 2016 हेतु कुछ सुझाव तैयार किये थे। इन सभी सुझावों को स्वीकार्य करते हुए कस्तूरी रंगन की अध्यक्षता में नयी शिक्षा नीति तैयार करने हेतु समिति का गठन किया गया था।
प्रारूप के कुछ प्रमुख प्रावधान-
प्रारूप नें ऐक्सेस, इक्विटी,क्वालिटी,एफर्टबिलिटी,एकाउंटबिलिटी फेस्ड बाई द करंट एजुकेशन सिस्टम यानी वर्तमान शिक्षा प्रणाली में जिम्मेदारी की कमी जैसी चुनौतियों के समाधान खोजनें की बात कही है। इसके अलावा ड्राफ्ट में स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक हर स्तर पर सुधारों की बात की गयी है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में सुधार- शिक्षकों के प्रशिक्षण में मजबूती और शिक्षा के रेग्यूलेटरी फ्रेमवर्क को पुनर्गठित करने पर जोर दिया गया है। ड्राफ्ट में एक राष्ट्रीय शिक्षा आयोग गठित करने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा शिक्षा में सार्वजनिक निवेशकों को बढ़ावा देना, तकनीक के प्रयोग को बढ़ावा देना, व्यवसायिक और प्रौढ़ शिक्षा पर जोर देना जैसे कुछ प्रावधान शामिल हैं। अब बात करते हैं,स्कूली शिक्षा में सुझाए गये प्रमुख सुधारों की- अर्ली चाइल्डहुड केयर एजुकेशन की बात करें तो ड्राफ्ट में चल रही अर्ली चाइल्डहुड लर्निंग कार्यक्रमों के गुणवत्ता की स्तर में कई कमियों का जिक्र किया गया है। मसलन पाठ्यक्रम जो कि बच्चों की विकासात्मक जरूरतों को पूरा करनें में सक्षम नहीं है।प्रशिक्षित और योग्य शिक्षकों का अभाव और स्तरहीन अध्यापन- वर्तमान में अधिकांश अर्ली चाइल्डहुड लर्निंग कार्यक्रम आंगनवाड़ी और निजी प्राइवेट स्कूलों द्वारा संचालित किये जाते हैं,जिसमें अर्ली चाइल्डहुड के शैक्षणिक आयामों पर कम ध्यान केन्द्रित किया जाता है। ड्राफ्ट में अर्ली चाइल्डहुड केयर और शिक्षा के लिए दो हिस्सों में पाठ्यक्रम को विकसित करनें के लिये कहा गया है। इसमें शामिल बिन्दु होंगे- 3 साल तक के बच्चों के लिए पैरेंट्स और शिक्षकों के लिए दिशा निर्देश। 3-8 साल के बच्चों के लिए एजुकेशनल फ्रेम्वर। इसे लागू करने के लिए आंगनवाड़ी तंत्र में सुधार और विस्तार के अलावा आंगनवाड़ियों को प्राथमिक विद्दालयों के साथ स्थापित किये जाने का प्रस्ताव किया गया है। 3-6 साल तक के सभी बच्चों के लिए 2025 तक निःशुल्क,सुरक्षित,उच्च गुणवत्ता के साथ समुचित देखभाल और शिक्षा मुहैया कराने का प्रस्ताव भी किया गया है। शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 की बात करें तो वर्तमान में आर टी ई एक्ट के तहत 6-14 साल तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दी जाती है। ड्राफ्ट में इस सीमा को अर्ली चाइल्डहुड एजुकेशन से लेकर सेकेंड्री स्कूल एजुकेशन तक बढ़ाने की बात की गयी है,जिसे यह अधिनियम के तहत 3-18 साल तक के बच्चे शामिल हो जायेंगे। करीकुलम फ्रेमवर्क से संबंधित सुधारों की बात करें तो वर्तमान विद्दालयी शिक्षा को विद्दार्थियों की आवश्यकता के अनुरूप बनाये जाने की आवश्यकता है। इसमें 5334 डिजाइन का सुझाव दिया गया है। इसका मतलब हुआ कि ★आधारभूत चरण में 5 साल-
3साल प्री प्राइमरी स्कूल, कक्षा 1 और 2 शामिल होंगें।
★प्राथमिक चरण के 3 साल-
इसमें कक्षा 3-5 तक के शामिल होंगें।
★माध्यमिक चरण के 3 साल-
इसमें कक्षा 6-8 तक के शामिल होंगें।
★सेकेंड्री स्टेज के 4 साल-
इसमें 9-12 तक की कक्षाएं शामिल होंगी।
समिति का मानना है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली तथ्यों और विधियों को रटानें पर केंद्रित है। लास्ट में सिफारिश की गयी है कि हर विषयों के पाठ्यक्रम के बोझ को कम करके आवश्यक कोर कंटेंट पर लाया जाना चाहिए। इससे ब्यापक चर्चा और विश्लेषण आधारित सीखनें की परिस्थितियाँ बनेंगी तथा 7 और 8 के विद्दार्थियों के लिए एक सेशन में हर हफ्ते में एक पीरियड गंभीर मुद्दों के लिए प्रस्तावित किया गया है। ये वे मुद्दे हैं जिनका उनके आस-पास के लोगों द्वारा सामना किया जा रहा है। इन मुद्दों में जलवायु परिवर्तन,स्वछता,लैंगिक समानता,स्वच्छ भारत,सामाजिक न्याय,विज्ञान और समाज में इनका मेल आदि शामिल है। कक्षा 9-12 तक सभी विद्दार्थियों की हफ्ते में एक दिन करेंट अफेयर्स क्लास भी प्रस्तावित है। विद्दालयी परिक्षा में सुधार के स्तर पर समिति नेंं वर्तमान में बोर्ड परिक्षाओं में कुछ चुनौतियों का जिक्र किया है। मसलन विद्दार्थियों पर केवल कुछ ही विषयों को पढ़नेंं का दबाव रहता है और रचनात्मकता की परिक्षा नहीं ली जाती है। विद्दार्थियों की प्रगति को ट्रैक करनेंं के लिए ड्राफ्ट में कक्षा 3,5और 8 में स्टेटस सेंसेस इक्जामिनेशन का प्रस्ताव किया गया है। बोर्ड परिक्षाएँ केवल कोर कांसेप्ट,स्किल्स और उच्च स्तरीय क्षमताओं को जांचनें के लिए ली जानी चाहिए।समिति नें कई सारे सार्वजनिक विद्दालयों को मिलाकर एक स्कूल काम्पलेक्स के निर्माण की बात की है। इस काम्पलेक्स में एक सेकेंड्री स्कूल होगा।इसके अलावा बाकी के विद्दालयों में प्री प्राइमरी से लेकर कक्षा 8 तक शिक्षा दी जायेगी। स्कूल काम्पलेक्स में आंगनवाड़ी,व्यवसायिक शिक्षा केन्द्र और प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र भी शामिल होंगे। इससे अवसंरचना और प्रशिक्षित अध्यापक स्कूल काम्पलेक्स में प्रभावी ढंग से साझा किये जा सकेंगे। समिति नें सिफारिश की है कि अध्यापक को एक स्कूल कांम्पलेक्स में 5-7 साल के लिए नियुक्त किया जाना चाहिए। अध्यापकों को स्कूली घण्टों के दौरान किसी भी गैर शैक्षणिक गतिविधी मसलन मिड डे मील का खाना बनाना, वैक्सीनेशन कैंपेन में भागीदारी आदि की मनाही होनी चाहिए वर्तमान में चल रहे बीएड कार्यक्रम को 4 साल के लिए एकीकृत बीएड कार्यक्रम में बदला जायेगा,जिसमें उच्च गुणवत्ता वाला कंटेंट अध्यापन और व्यवहारिक प्रशिक्षण शामिल होगा। हर राज्य के लिए एक स्टेट स्कूल रेगूलेट्री अथारिटी के निर्माण की भी सिफारिश की गयी है,जो सरकारी व निजि स्कूल के लिए मानक निर्धारित करेगी। डिपार्टमेंट आफ एजूकेशन नीति का निर्माण करनें के साथ निगरानी भी करेगा।
अब बात करते हैं उच्च शिक्षा से संबंधित सुधारों पर ऑल इण्डिया सर्वे ऑन हायर एजूकेशन के अनुसार भारत में ,उच्च शिक्षा में ग्रास एनरोलमेंट रेशियो2011-12 की 20.8% के मुकाबले 2017-18 में 25.8% हो गया है। हालांकि यह अनुपात चीन,अमेरिका और जर्मनी जैसे देशों की तुलना में काफी कम है। ड्राफ्ट में 2025 तक ग्रास एनरोलमेंट रेशियो को 50% करने का लक्ष्य रखा गया है। समिति के अनुसार वर्तमान में उच्चतर शिक्षा में कई नियामक हैं और उनके उद्देश्य एक दूसरे से ओवरलैप करते हैं। इस वजह से उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्ता में कमी और निर्भरता का माहौल बनता है। ड्राफ्ट में नेशनल हॉयर एजूकेशन रेगुलेट्री अथार्टी यानी राष्ट्रीय उच्च शिक्षा नियामक प्राधिकरण का प्रस्ताव किया गया है। वहीं ए आई सी टी ई और बार काउंसिल ऑफ इण्डिया को प्रोफेशनल प्रैक्टिस के मानकों का निर्धारण करनें तक सीमित करनें का प्रस्ताव किया गया है। इसके अलावा यू जी सी को हॉयर एजूकेशन का ग्रांट्स काउंसिल में तब्दील करके इसकी भूमिका को संस्थानों की फंडिंग तक सीमित करनें का प्रस्ताव है। ए आई सी टी ई(ऑल इण्डिया काउंसिल फार टेक्निकल एजूकेशन) की फंडिंग भूमिका को हॉयर एजूकेशन ग्रांट्स काउंसिल को ट्रांसफर करनें का प्रस्ताव किया गया है। नेशनल असेसमेंट एण्ड एक्रीडिटेशन काउंसिल(एन ए ए सी) वर्तमान(राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद) में यू जी सी(यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन) के अंतर्गत एक निकाय है। ड्राफ्ट में एन ए ए सी को यू जी सी से स्वतंत्र और स्वायत्त संस्थान बनानें की सिफारिश की गयी है। एन ए ए सी को एक उच्च स्तर की प्रमाणक संस्था का दर्जा दिये जाने के साथ हर 5-7 साल में उच्च शीक्षा संस्थानों का आकलन करनें की भूमिका का प्रस्ताव किया गया है। ड्राफ्ट पॉलिशी में सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को 2030 तक प्रमाणन करनें का लक्ष्य रखा गया है। नये उच्च शिक्षा संस्थानों की बात करें तो इनकी स्थापना संसदीय,राज्य की विधानसभा या राष्ट्रीय उच्च शिक्षा नियामक प्राधिकरण यानी एन एच ई आर ए(नेशनल हॉयर एजूकेशन रेगुलेट्री अथार्टी) के एच ई आई चार्टर के माध्यम से की जायेगी। सभी नये बनें उच्च शिक्षा संस्थानों में एन एच ई आर ए के स्थापना के 5 सालों के भीतर प्रमाणन लेना जरुरी होगा। ड्राफ्ट पॉलिशी में 3 प्रकार के उच्च शिक्षा संस्थानों की बात की गयी है। इसमें टाइप फर्स्ट- रिसर्च यूनीवर्सिटी
टाइप टू- टीचिंग यूनिवर्सिटी
टाइप थ्री- कॉलेजेस
ड्राफ्ट पॉलिशी के प्रस्ताव के अनुसार 2020 से टाइप थ्री प्रकार के जो भी कॉलेज स्थापित होंगे, वे स्वायत्त होंगे। 2020 से कोई भी नया कॉलेज संबद्ध प्रकार का स्थापित नहीं होगा। इसके अलावा 2030 से कोई भी संबद्ध प्रकार का कॉलेज अस्तित्व में नहीं रहेगा। ऐसे कॉलेज की स्थापना का प्रस्ताव है, जो डिग्री प्रदान कर सकें या यूनिवर्सिटी प्रकार के हों। ड्राफ्ट पॉलिशी के अनुसार भारत में शोध और नवाचार के क्षेत्र में कमी आयी है। 2008 में जी डी पी के 0.84% के मुकाबले 2014 में 0.69% है। इस संदर्भ में अन्य देशों की तुलना करें तो यू एस ए में जी डी पी का 2.8%, चीन मेंं 2.1%, इजराइल में 4.3% और साउथ कोरिया में 4.2% है। ये निवेश भारत की तुलना में काफी अधिक है। ड्राफ्ट पॉलिशी में एक स्वायत्त निकाय के रूप में नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना के लिए सिफारिश की गयी है,जिसका कार्य-फंडिग,मॉनीटरिंग और क्षमता निर्माण से संबंधित होगा। फाउंडेशन को साल भर में 20 हजार करोड़ का अनुदान मुहैया कराया जायेगा। उच्च शिक्षा गुणवत्ता परक शिक्षा के लिए 2035 तक नालंदा और तक्षशिला मिशन भी चलाए जानें का प्रस्ताव है।
शिक्षा से संबंधित शासन-
ड्राफ्ट पॉलिशी में भारतीय शिक्षा के लिए एक सर्वोच्च निकाय "राष्ट्रीय शिक्षा आयोग" की स्थापना का प्रस्ताव किया गया है। आयोग के अध्यक्ष प्रधानमंत्री और उपाध्यक्ष शिक्षा मंत्री होंगे। प्रधानमंत्री साल में कम से कम एक बार आयोग के साथ बैठक करेंगे। यह निकाय देश में शिक्षा के विजन को निर्माण करने,लागू करनें और निगरानी करनें के लिए जिम्मेदार होगा। राष्ट्रीय स्तर के निकाय ; राष्ट्रीय शिक्षा आयोग को रिपोर्ट करेंगे। राष्ट्रीय उच्च शिक्षा नियामक प्राधिकरण, जनरल एजूकेशन काउंसिल,नेशनल रिसर्च फाउंडेशन, हॉयर एजूकेशन ग्रांट्स ये सभी निकाय प्रस्तावित हैं;जो राष्ट्रीय शिक्षा आयोग को रिपोर्ट करेंगे। इसके अलावा पहले से मोजूद निकाय मसलन एन ए ए सी,एन सी ई आर टी,नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजूकेशनल प्लानिंग एण्ड एडमिनिस्ट्रेशन भी राष्ट्रीय शिक्षा आयोग को रिपोर्ट करेंगे।मानव विकास मंत्रालय को शिक्षा मंत्रालय नाम दिये जानें की बात की गयी है,जिससे शिक्षा की तरफ फिर से ध्यान वापस लाया जा सके। राष्ट्रीय शिक्षा आयोग और शिक्षा मंत्रालय द्वारा 2020 तक अकादमिक नेतृत्व संस्थान के रुप में जनरल एजूकेशन काउंसिल की स्थापना का प्रस्ताव किया गया है।
शिक्षा में तकनीकी से संबंधित प्रस्ताव-
इस नीति में 2020 तक नेशनल एजूकेशन टेक्नोलॉजी फोरम की स्थापना की बात की गयी है। यह फोरम शिक्षा में तकनीक से संबंधित पहलों का रिव्यु करनें के अलावा बेहतर अनुभवों को साझा करनें की भी जिम्मेदारी लेगी। इसके अलावा 2020 तक नेशनल रिपोर्टगेट्री ऑफ एजूकेशनल डेटा को स्थापित करनें का प्रस्ताव है;जिससे तकनीक का प्रयोग शासन और प्रबंधन को बेहतर बनाये जानें के लिए किया जा सके।
शिक्षा से संबंधित खर्च-
2017-18 में;भारत में शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च जी डी पी का 2.7% था। यह कुल सरकारी खर्च यानी केंद्र और राज्यों के कुल खर्च का लगभग 10% है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 पर सार्वजनिक खर्च को जी डी पी का 6% करनें की प्रतिबद्धता व्यक्त की गयी है। ड्राफ्ट में कहा गया है कि यह तभी संभव होगा जब भारत में जी डी पी के टैक्स रेशियो में सुधार होगा। गोरतलब है कि 1968 और 1986 की नीतियों के आलावा 1992 के प्रोग्राम ऑफ एक्शन में यह प्रतिबध्दता व्यक्त की गयी थी। नीति में शिक्षा पर कुल सार्वजनिक खर्च को 20% तक बढ़ानें की बात की गयी है। प्रौढ़ शिक्षा से संबंधित सुझावों पर ड्राफ्ट पॉलिशी में 2030 तक युवा एवं प्रौढ़ साक्षरता दर को 100% तक पहुँचानें का लक्ष्य रखा गया है।इसके लिए समुदाय, स्वंसेवी संस्थाओं और स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं को बढ़ावा देनें की बात की गयी है। पिछले जनगणना के मुताबिक भारत में अभी भी 3.26 करोड़ युवा जो 15-24 आयु वर्ग के हैं और कुल मिलाकर 26.5 करोड़ वयस्क यानी 15 वर्ष से अधिक आयु के गैर साक्षर हैं यह संख्या स्कूलों और उच्च शिक्षा क्षेत्रों के कुल संख्या के बराबर है;जो कि संपूर्ण विशव की गैर साक्षर जनसंख्या का एक तिहाई भाग है। अब देखते हैं कि क्या हो आगे की राह- नीति की प्रस्तावना में भी कहा गया है कि नीति तभी अच्छी होगी ;जब इसे सही ढंग से लागू किया जाये। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 अभी मसौदे के तोर पर पब्लिक डोमेंन में है इस पर अभी सिविल सोसाइटीज ,निजि और सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा राय आना बाकी है। नीति पर सभी हितधारकों से विचार विमर्श के बाद इसे लागू किया जायेगा।
MR.AKASH BIND
प्रस्तावना-
"शिक्षा सर्वशक्तिशाली हतियार है ,जिसे दुनिया को बदलने में इस्तेमाल किया जा सकता है"- नेल्सन मण्डेला
"शिक्षा मानव संसाधन विकास का सार है ,जो देश के आर्थिक,सामाजिक ताने-बाने को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जून 2017 में मानव विकास मंत्रालय द्वारा डॉ के कस्तूरी रंगन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी थी ।समिति नें "शिक्षा नीति 2019" की अपनी रिपोर्ट 30 मई 2019 को सौंपी थी। रिपोर्ट में व्यापक आयामों को शामिल करते हुये एक समग्र शिक्षा नीति तैयार की गयी है। नीति अपनें उद्देश्य में भारत केंद्रित शिक्षा प्रणाली की कल्पना करती है, जो सभी को उच्च गुणवत्ता प्रदान कर हमारे राष्ट्र को लगातार न्याय संगत और जीवंत न्याय समाज में बदलने में योगदान देगी।सरकार नें नीति के प्रारुप को सुझावों के लिए पब्लिक डोमेन में रखा है। प्रारूप के मूल रूप में हिन्दी को सभी राज्यों में त्रिभाषा सूत्र के तहत पढ़ाना अनिवार्य किया गया था। इसके बाद तमिलनाडु के राजनेताओं नें विरोध जताया था। जिसके परिणाम स्वरुप हिन्दी की अनिवार्यता को हटा दिया गया। अब वर्तमान में संशोधित प्रारूप पब्लिक डोमेन में है।
वैश्विक शिक्षा नीति-
यू.एन.ओ. के महासभा द्वारा 1948 में अपनाये गये ऐतिहासिक मानवाधिकार घोसणा पत्र की बात करें तो इसके अनुसार सभी को शिक्षा का अधिकार है। इसके अन्नुछेद 26 में कहा गया है कि कम से कम प्रारंभिक और मौलिक चरणों में शिक्षा निःशुल्क होनी चाहिए। इसके अलावा 21वीं सदी के लिए जैक्स डेलर्स/डीलर्स की अध्यक्षता में अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा आयोग का गठन किया गया। डीलर्स नें अपनी रिपोर्ट "लर्निंग द् ट्रेजर्स विदिन " नाम से यूनेस्को को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।इसके अनुसार शिक्षा का परिणाम -"मानव का सर्वांगिण विकास होना चाहिए।" सतत् विकास लक्ष्य (लक्ष्य संख्या 4) में सभी के लिए गुणवत्ता परक शिक्षा की बात की गई है।
भारत में शिक्षा नीति-
यदि भारतिय संविधान की बात करें तो इसके अंतर्गत शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। संविधान के अन्नुछेद 21अ में 6-14 वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है। और मौलिक कर्त्तव्य में भी माता-पिता या प्रतिपालकों द्वारा 6-14 वर्ष तक की उम्र के बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान कराने का प्रावधान है। इसे 86वें संविधान संशोधन 2002 के द्वारा 11वां मौलिक कर्त्तव्य के रूप में जोड़ा गया था। नीति निदेशक तत्व में भी अन्नुछेद 45के तहत 6 वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देख-रेख और शिक्षा देने के लिए राज्य उपबंध करेगा
क्या है त्रिभाषा सूत्र-
दरसल त्रिभाषा सूत्र नेशनल पॉलिशी आन एजुकेशन 1968 के तहत लाया गया था। इसके अनुसार राज्यों को द्वितियक स्तर पर त्रिभाषा सूत्र अपनाना चाहिए ओर इसे जोरदार ढंग से लागू भी करना चाहिए। इसमें हिन्दी भाषी राज्यों को अपने यहां हिन्दी और अंग्रेजी के अलावा कोई एक आधूनिक भारतीय भाषा विशेष तौर पर दक्षिणी राज्यों की किसी भांंषा का अध्ययन करवाना चाहिए। वहीं गैर हिन्दी भाषी राज्यों को अपनें यहां हिन्दी और अंग्रेजी के साथ क्षेत्रीय भांषा का भी अध्ययन करवाना चाहिए। "राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019" के प्रारुप में विवाद यह है कि गैर हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी को पढ़ाना अनिवार्य किया गया था। हालांकि ड्राफ्ट में कहा गया था; कि जो 3 भाषाओं को छोड़ना चाहते हैं, वे कक्षा 6 से ऐसा कर सकते हैं। ड्राफ्ट के जारी होने के बाद तमिलनाडु के राजनेताओं द्वारा इस पर कड़ा प्रतिरोध जताया गया। केन्द्र में इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा गया कि यह नीति अभी ड्राफ्ट के तौर पर है और अंतिम रूप से नीति जारी होना अभी बाकी है और किसी भी शिक्षण संस्थान में किसी भी भाषा को न तो थोपा जायेगा और न ही किसी भाषा के साथ भेदभाव किया जायेगा। बहराल इस मुद्दे पर समिति नें ड्राफ्ट से हिन्दी की अनिवार्यता को हटा दिया है।
ऐतिहासिक पहलू-
शिक्षा नीति के प्रमुख प्रावधानों पर चर्चा करने से पहले आपको बता दें कि डॉ के कस्तूरी रंगन समिति के गठन के पहले मानव विकास मंत्रालय द्वारा अक्टूबर 2015 में स्वर्गीय पी एस सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में नयी शिक्षा नीति के विकास के लिए समिति का गठन किया गया था। इस समिति नें मई 2016 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। जिसके आधार पर मंत्रालय नें नयी शिक्षा नीति 2016 हेतु कुछ सुझाव तैयार किये थे। इन सभी सुझावों को स्वीकार्य करते हुए कस्तूरी रंगन की अध्यक्षता में नयी शिक्षा नीति तैयार करने हेतु समिति का गठन किया गया था।
प्रारूप के कुछ प्रमुख प्रावधान-
प्रारूप नें ऐक्सेस, इक्विटी,क्वालिटी,एफर्टबिलिटी,एकाउंटबिलिटी फेस्ड बाई द करंट एजुकेशन सिस्टम यानी वर्तमान शिक्षा प्रणाली में जिम्मेदारी की कमी जैसी चुनौतियों के समाधान खोजनें की बात कही है। इसके अलावा ड्राफ्ट में स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक हर स्तर पर सुधारों की बात की गयी है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में सुधार- शिक्षकों के प्रशिक्षण में मजबूती और शिक्षा के रेग्यूलेटरी फ्रेमवर्क को पुनर्गठित करने पर जोर दिया गया है। ड्राफ्ट में एक राष्ट्रीय शिक्षा आयोग गठित करने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा शिक्षा में सार्वजनिक निवेशकों को बढ़ावा देना, तकनीक के प्रयोग को बढ़ावा देना, व्यवसायिक और प्रौढ़ शिक्षा पर जोर देना जैसे कुछ प्रावधान शामिल हैं। अब बात करते हैं,स्कूली शिक्षा में सुझाए गये प्रमुख सुधारों की- अर्ली चाइल्डहुड केयर एजुकेशन की बात करें तो ड्राफ्ट में चल रही अर्ली चाइल्डहुड लर्निंग कार्यक्रमों के गुणवत्ता की स्तर में कई कमियों का जिक्र किया गया है। मसलन पाठ्यक्रम जो कि बच्चों की विकासात्मक जरूरतों को पूरा करनें में सक्षम नहीं है।प्रशिक्षित और योग्य शिक्षकों का अभाव और स्तरहीन अध्यापन- वर्तमान में अधिकांश अर्ली चाइल्डहुड लर्निंग कार्यक्रम आंगनवाड़ी और निजी प्राइवेट स्कूलों द्वारा संचालित किये जाते हैं,जिसमें अर्ली चाइल्डहुड के शैक्षणिक आयामों पर कम ध्यान केन्द्रित किया जाता है। ड्राफ्ट में अर्ली चाइल्डहुड केयर और शिक्षा के लिए दो हिस्सों में पाठ्यक्रम को विकसित करनें के लिये कहा गया है। इसमें शामिल बिन्दु होंगे- 3 साल तक के बच्चों के लिए पैरेंट्स और शिक्षकों के लिए दिशा निर्देश। 3-8 साल के बच्चों के लिए एजुकेशनल फ्रेम्वर। इसे लागू करने के लिए आंगनवाड़ी तंत्र में सुधार और विस्तार के अलावा आंगनवाड़ियों को प्राथमिक विद्दालयों के साथ स्थापित किये जाने का प्रस्ताव किया गया है। 3-6 साल तक के सभी बच्चों के लिए 2025 तक निःशुल्क,सुरक्षित,उच्च गुणवत्ता के साथ समुचित देखभाल और शिक्षा मुहैया कराने का प्रस्ताव भी किया गया है। शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 की बात करें तो वर्तमान में आर टी ई एक्ट के तहत 6-14 साल तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा दी जाती है। ड्राफ्ट में इस सीमा को अर्ली चाइल्डहुड एजुकेशन से लेकर सेकेंड्री स्कूल एजुकेशन तक बढ़ाने की बात की गयी है,जिसे यह अधिनियम के तहत 3-18 साल तक के बच्चे शामिल हो जायेंगे। करीकुलम फ्रेमवर्क से संबंधित सुधारों की बात करें तो वर्तमान विद्दालयी शिक्षा को विद्दार्थियों की आवश्यकता के अनुरूप बनाये जाने की आवश्यकता है। इसमें 5334 डिजाइन का सुझाव दिया गया है। इसका मतलब हुआ कि ★आधारभूत चरण में 5 साल-
3साल प्री प्राइमरी स्कूल, कक्षा 1 और 2 शामिल होंगें।
★प्राथमिक चरण के 3 साल-
इसमें कक्षा 3-5 तक के शामिल होंगें।
★माध्यमिक चरण के 3 साल-
इसमें कक्षा 6-8 तक के शामिल होंगें।
★सेकेंड्री स्टेज के 4 साल-
इसमें 9-12 तक की कक्षाएं शामिल होंगी।
समिति का मानना है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली तथ्यों और विधियों को रटानें पर केंद्रित है। लास्ट में सिफारिश की गयी है कि हर विषयों के पाठ्यक्रम के बोझ को कम करके आवश्यक कोर कंटेंट पर लाया जाना चाहिए। इससे ब्यापक चर्चा और विश्लेषण आधारित सीखनें की परिस्थितियाँ बनेंगी तथा 7 और 8 के विद्दार्थियों के लिए एक सेशन में हर हफ्ते में एक पीरियड गंभीर मुद्दों के लिए प्रस्तावित किया गया है। ये वे मुद्दे हैं जिनका उनके आस-पास के लोगों द्वारा सामना किया जा रहा है। इन मुद्दों में जलवायु परिवर्तन,स्वछता,लैंगिक समानता,स्वच्छ भारत,सामाजिक न्याय,विज्ञान और समाज में इनका मेल आदि शामिल है। कक्षा 9-12 तक सभी विद्दार्थियों की हफ्ते में एक दिन करेंट अफेयर्स क्लास भी प्रस्तावित है। विद्दालयी परिक्षा में सुधार के स्तर पर समिति नेंं वर्तमान में बोर्ड परिक्षाओं में कुछ चुनौतियों का जिक्र किया है। मसलन विद्दार्थियों पर केवल कुछ ही विषयों को पढ़नेंं का दबाव रहता है और रचनात्मकता की परिक्षा नहीं ली जाती है। विद्दार्थियों की प्रगति को ट्रैक करनेंं के लिए ड्राफ्ट में कक्षा 3,5और 8 में स्टेटस सेंसेस इक्जामिनेशन का प्रस्ताव किया गया है। बोर्ड परिक्षाएँ केवल कोर कांसेप्ट,स्किल्स और उच्च स्तरीय क्षमताओं को जांचनें के लिए ली जानी चाहिए।समिति नें कई सारे सार्वजनिक विद्दालयों को मिलाकर एक स्कूल काम्पलेक्स के निर्माण की बात की है। इस काम्पलेक्स में एक सेकेंड्री स्कूल होगा।इसके अलावा बाकी के विद्दालयों में प्री प्राइमरी से लेकर कक्षा 8 तक शिक्षा दी जायेगी। स्कूल काम्पलेक्स में आंगनवाड़ी,व्यवसायिक शिक्षा केन्द्र और प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र भी शामिल होंगे। इससे अवसंरचना और प्रशिक्षित अध्यापक स्कूल काम्पलेक्स में प्रभावी ढंग से साझा किये जा सकेंगे। समिति नें सिफारिश की है कि अध्यापक को एक स्कूल कांम्पलेक्स में 5-7 साल के लिए नियुक्त किया जाना चाहिए। अध्यापकों को स्कूली घण्टों के दौरान किसी भी गैर शैक्षणिक गतिविधी मसलन मिड डे मील का खाना बनाना, वैक्सीनेशन कैंपेन में भागीदारी आदि की मनाही होनी चाहिए वर्तमान में चल रहे बीएड कार्यक्रम को 4 साल के लिए एकीकृत बीएड कार्यक्रम में बदला जायेगा,जिसमें उच्च गुणवत्ता वाला कंटेंट अध्यापन और व्यवहारिक प्रशिक्षण शामिल होगा। हर राज्य के लिए एक स्टेट स्कूल रेगूलेट्री अथारिटी के निर्माण की भी सिफारिश की गयी है,जो सरकारी व निजि स्कूल के लिए मानक निर्धारित करेगी। डिपार्टमेंट आफ एजूकेशन नीति का निर्माण करनें के साथ निगरानी भी करेगा।
अब बात करते हैं उच्च शिक्षा से संबंधित सुधारों पर ऑल इण्डिया सर्वे ऑन हायर एजूकेशन के अनुसार भारत में ,उच्च शिक्षा में ग्रास एनरोलमेंट रेशियो2011-12 की 20.8% के मुकाबले 2017-18 में 25.8% हो गया है। हालांकि यह अनुपात चीन,अमेरिका और जर्मनी जैसे देशों की तुलना में काफी कम है। ड्राफ्ट में 2025 तक ग्रास एनरोलमेंट रेशियो को 50% करने का लक्ष्य रखा गया है। समिति के अनुसार वर्तमान में उच्चतर शिक्षा में कई नियामक हैं और उनके उद्देश्य एक दूसरे से ओवरलैप करते हैं। इस वजह से उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्ता में कमी और निर्भरता का माहौल बनता है। ड्राफ्ट में नेशनल हॉयर एजूकेशन रेगुलेट्री अथार्टी यानी राष्ट्रीय उच्च शिक्षा नियामक प्राधिकरण का प्रस्ताव किया गया है। वहीं ए आई सी टी ई और बार काउंसिल ऑफ इण्डिया को प्रोफेशनल प्रैक्टिस के मानकों का निर्धारण करनें तक सीमित करनें का प्रस्ताव किया गया है। इसके अलावा यू जी सी को हॉयर एजूकेशन का ग्रांट्स काउंसिल में तब्दील करके इसकी भूमिका को संस्थानों की फंडिंग तक सीमित करनें का प्रस्ताव है। ए आई सी टी ई(ऑल इण्डिया काउंसिल फार टेक्निकल एजूकेशन) की फंडिंग भूमिका को हॉयर एजूकेशन ग्रांट्स काउंसिल को ट्रांसफर करनें का प्रस्ताव किया गया है। नेशनल असेसमेंट एण्ड एक्रीडिटेशन काउंसिल(एन ए ए सी) वर्तमान(राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद) में यू जी सी(यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन) के अंतर्गत एक निकाय है। ड्राफ्ट में एन ए ए सी को यू जी सी से स्वतंत्र और स्वायत्त संस्थान बनानें की सिफारिश की गयी है। एन ए ए सी को एक उच्च स्तर की प्रमाणक संस्था का दर्जा दिये जाने के साथ हर 5-7 साल में उच्च शीक्षा संस्थानों का आकलन करनें की भूमिका का प्रस्ताव किया गया है। ड्राफ्ट पॉलिशी में सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को 2030 तक प्रमाणन करनें का लक्ष्य रखा गया है। नये उच्च शिक्षा संस्थानों की बात करें तो इनकी स्थापना संसदीय,राज्य की विधानसभा या राष्ट्रीय उच्च शिक्षा नियामक प्राधिकरण यानी एन एच ई आर ए(नेशनल हॉयर एजूकेशन रेगुलेट्री अथार्टी) के एच ई आई चार्टर के माध्यम से की जायेगी। सभी नये बनें उच्च शिक्षा संस्थानों में एन एच ई आर ए के स्थापना के 5 सालों के भीतर प्रमाणन लेना जरुरी होगा। ड्राफ्ट पॉलिशी में 3 प्रकार के उच्च शिक्षा संस्थानों की बात की गयी है। इसमें टाइप फर्स्ट- रिसर्च यूनीवर्सिटी
टाइप टू- टीचिंग यूनिवर्सिटी
टाइप थ्री- कॉलेजेस
ड्राफ्ट पॉलिशी के प्रस्ताव के अनुसार 2020 से टाइप थ्री प्रकार के जो भी कॉलेज स्थापित होंगे, वे स्वायत्त होंगे। 2020 से कोई भी नया कॉलेज संबद्ध प्रकार का स्थापित नहीं होगा। इसके अलावा 2030 से कोई भी संबद्ध प्रकार का कॉलेज अस्तित्व में नहीं रहेगा। ऐसे कॉलेज की स्थापना का प्रस्ताव है, जो डिग्री प्रदान कर सकें या यूनिवर्सिटी प्रकार के हों। ड्राफ्ट पॉलिशी के अनुसार भारत में शोध और नवाचार के क्षेत्र में कमी आयी है। 2008 में जी डी पी के 0.84% के मुकाबले 2014 में 0.69% है। इस संदर्भ में अन्य देशों की तुलना करें तो यू एस ए में जी डी पी का 2.8%, चीन मेंं 2.1%, इजराइल में 4.3% और साउथ कोरिया में 4.2% है। ये निवेश भारत की तुलना में काफी अधिक है। ड्राफ्ट पॉलिशी में एक स्वायत्त निकाय के रूप में नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना के लिए सिफारिश की गयी है,जिसका कार्य-फंडिग,मॉनीटरिंग और क्षमता निर्माण से संबंधित होगा। फाउंडेशन को साल भर में 20 हजार करोड़ का अनुदान मुहैया कराया जायेगा। उच्च शिक्षा गुणवत्ता परक शिक्षा के लिए 2035 तक नालंदा और तक्षशिला मिशन भी चलाए जानें का प्रस्ताव है।
शिक्षा से संबंधित शासन-
ड्राफ्ट पॉलिशी में भारतीय शिक्षा के लिए एक सर्वोच्च निकाय "राष्ट्रीय शिक्षा आयोग" की स्थापना का प्रस्ताव किया गया है। आयोग के अध्यक्ष प्रधानमंत्री और उपाध्यक्ष शिक्षा मंत्री होंगे। प्रधानमंत्री साल में कम से कम एक बार आयोग के साथ बैठक करेंगे। यह निकाय देश में शिक्षा के विजन को निर्माण करने,लागू करनें और निगरानी करनें के लिए जिम्मेदार होगा। राष्ट्रीय स्तर के निकाय ; राष्ट्रीय शिक्षा आयोग को रिपोर्ट करेंगे। राष्ट्रीय उच्च शिक्षा नियामक प्राधिकरण, जनरल एजूकेशन काउंसिल,नेशनल रिसर्च फाउंडेशन, हॉयर एजूकेशन ग्रांट्स ये सभी निकाय प्रस्तावित हैं;जो राष्ट्रीय शिक्षा आयोग को रिपोर्ट करेंगे। इसके अलावा पहले से मोजूद निकाय मसलन एन ए ए सी,एन सी ई आर टी,नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजूकेशनल प्लानिंग एण्ड एडमिनिस्ट्रेशन भी राष्ट्रीय शिक्षा आयोग को रिपोर्ट करेंगे।मानव विकास मंत्रालय को शिक्षा मंत्रालय नाम दिये जानें की बात की गयी है,जिससे शिक्षा की तरफ फिर से ध्यान वापस लाया जा सके। राष्ट्रीय शिक्षा आयोग और शिक्षा मंत्रालय द्वारा 2020 तक अकादमिक नेतृत्व संस्थान के रुप में जनरल एजूकेशन काउंसिल की स्थापना का प्रस्ताव किया गया है।
शिक्षा में तकनीकी से संबंधित प्रस्ताव-
इस नीति में 2020 तक नेशनल एजूकेशन टेक्नोलॉजी फोरम की स्थापना की बात की गयी है। यह फोरम शिक्षा में तकनीक से संबंधित पहलों का रिव्यु करनें के अलावा बेहतर अनुभवों को साझा करनें की भी जिम्मेदारी लेगी। इसके अलावा 2020 तक नेशनल रिपोर्टगेट्री ऑफ एजूकेशनल डेटा को स्थापित करनें का प्रस्ताव है;जिससे तकनीक का प्रयोग शासन और प्रबंधन को बेहतर बनाये जानें के लिए किया जा सके।
शिक्षा से संबंधित खर्च-
2017-18 में;भारत में शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च जी डी पी का 2.7% था। यह कुल सरकारी खर्च यानी केंद्र और राज्यों के कुल खर्च का लगभग 10% है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 पर सार्वजनिक खर्च को जी डी पी का 6% करनें की प्रतिबद्धता व्यक्त की गयी है। ड्राफ्ट में कहा गया है कि यह तभी संभव होगा जब भारत में जी डी पी के टैक्स रेशियो में सुधार होगा। गोरतलब है कि 1968 और 1986 की नीतियों के आलावा 1992 के प्रोग्राम ऑफ एक्शन में यह प्रतिबध्दता व्यक्त की गयी थी। नीति में शिक्षा पर कुल सार्वजनिक खर्च को 20% तक बढ़ानें की बात की गयी है। प्रौढ़ शिक्षा से संबंधित सुझावों पर ड्राफ्ट पॉलिशी में 2030 तक युवा एवं प्रौढ़ साक्षरता दर को 100% तक पहुँचानें का लक्ष्य रखा गया है।इसके लिए समुदाय, स्वंसेवी संस्थाओं और स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं को बढ़ावा देनें की बात की गयी है। पिछले जनगणना के मुताबिक भारत में अभी भी 3.26 करोड़ युवा जो 15-24 आयु वर्ग के हैं और कुल मिलाकर 26.5 करोड़ वयस्क यानी 15 वर्ष से अधिक आयु के गैर साक्षर हैं यह संख्या स्कूलों और उच्च शिक्षा क्षेत्रों के कुल संख्या के बराबर है;जो कि संपूर्ण विशव की गैर साक्षर जनसंख्या का एक तिहाई भाग है। अब देखते हैं कि क्या हो आगे की राह- नीति की प्रस्तावना में भी कहा गया है कि नीति तभी अच्छी होगी ;जब इसे सही ढंग से लागू किया जाये। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 अभी मसौदे के तोर पर पब्लिक डोमेंन में है इस पर अभी सिविल सोसाइटीज ,निजि और सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा राय आना बाकी है। नीति पर सभी हितधारकों से विचार विमर्श के बाद इसे लागू किया जायेगा।
MR.AKASH BIND
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