संवाधान दो शब्दों से मिलकर बना है-सम्+विधान
अर्थात समान विधान(नियम या कानून)
दूसरे शब्दों में ऐसे नियम या कानून;जो सभी के लिए समान हो। यह किसी राज्य,समूह या संगठन को सुव्यवस्थित ढंग से चलानें के लिए एक दस्तावेज होता है।यह लिखित या अलिखित दोनों रुपों में हो सकता है।
संविधान राष्ट्र का पवित्र दस्तावेज है। यह उन दर्शन या मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है;जिन पर कोई राष्ट्र विकसित होता है और उन लक्ष्यों की पहचान करता है जिस पर देश के नागरिकों की ऊर्जा को निर्देशित किया जाना चाहिए। यद्दपि यह दुखद है कि संविधान को जितना आदर और सम्मान मिलना चाहिए उतना नहीं मिल पाता है। संविधान को वकील और जैसे संभ्रात लोगों का दस्तावेज माना जाता है। इसे धार्मिक पुस्तकों(रामायण,भगवतगीता,कुरान,बाइबिल)की तरह हर घर में पढ़ा जाना चाहिए। इससे नागरिकों के अधिकार और कर्तव्य स्पष्ट रुप से समझ में आयेंगे।
हमारा संविधान शिक्षित करता है और जीवन जीनें के तरीके को बढ़ावा देता है। जो हर भारतीय के लिए जरुरी है।यदि हम इन आदर्शों का अनुसरण करते हैं, तो यह पूरे देश के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। संविधान की प्रस्तावना के अंतर्गत उन आदर्शों को आत्मसात किया गया है जिनके लिए हम प्रयास कर रहे हैं और इसके लिए एक मानसिक दृष्टिकोण आवश्यक है। प्रस्तावना जब हमें सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक न्याय,विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विश्वास तथा अवसर की समानता प्रदान करता है तो साथ ही नागरिकों के लिए आचार संहिता भी उपलब्ध कराता है। यदि हम प्रस्तावना के उद्देश्यों के प्रति अपनी मानसिक सोच को ध्यान में रखते हैं तो यह समाज के सभी वर्गों के लिए उपयोगी होगा। जब संविधान रोजगार में अवसर की समानता की बात करता है और जाति, धर्म,वंश,लिंग के आधार पर भेदभाव को रोकता है तो वह महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दे रहा होता है और यहां तक की जातिगत बंधनों को तोड़ रहा होता है। संविधान के प्रावधानों से भारतीय समाज के चेहरे को बदला जा सकता है। योग्यता के पनपनें का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। सर्वश्रेष्ठ को नेतृत्व के शीर्ष पदों पर जानें के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। संविधान की प्रस्तावना भारतीय संविधान को समाजवादी,और पंथ निरपेक्ष गणराज्य के रुप में स्थापित करनें के बारे में बात करती है। अन्नुछेद 21 में स्पष्टत: कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं रह सकता है यदि यही बात हमारे नागरिकों के दिमाग में शुरु से ही स्कूलों और घरों से ऐसी सोच हो ;तो ऐसी कोई बात नहीं होगी जिससे लोग कानून को अपनें हाथ में लें। 1976 में संसद द्वारा संविधान संशोधन के तहत एक नये अन्नुछेद 51ए को जोड़ा गया। यह नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों की बात करता है। ये कर्तव्य संविधान के प्रति सम्मान,समग्र,संस्कृति की समृध्द विरासत को संरक्षित करना,पर्यावरण में सुधार और सुरक्षा,हिंसा को रोकना एवं व्यक्तिगत और सामाजिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठता हासिल करना है। यदि सभी व्यक्ति अपनें कर्तव्यों का पालन करें तो यह सभी नागरिकों, सभी समुदायों,सभी सामाजिक और धार्मिक संगठनों और साथ ही साथ पूरे देश के लिए अच्छा कदम होगा। यह बेहतर जीवन और समावेशी विकास को सुनिश्चित करेगा। हालांकि यह तभी संभव होगा जब संविधान का प्रत्येक मौलिक व सामाजिक अन्नुछेद हमारे समाज के सभी वर्गों के लोगों विशेषकर युवावों के अंतःकरण में समाहित हो। संविधान को सजावटी टुकड़े के रुप में नहीं देखा जाना चाहिए,बल्कि इसे हर दिन पढ़ी जानें वाली पूजनीय और पवित्र पुस्तक के रुप में देखा जाना चाहिए।
सारांश-
अंततः यह कहा जा सकता है कि संविधान ही एक ऐसा माध्यम है जिसकी सहायता से हम सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक और मौलिक अधिकारों तथा कर्तव्यों को जान और समझकर अपनें और अपनें राष्ट्र के विकास में एक महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
"हमारा जो भी अधिकार है वो आपका कर्तव्य है"
MR.AKASH BIND
अर्थात समान विधान(नियम या कानून)
दूसरे शब्दों में ऐसे नियम या कानून;जो सभी के लिए समान हो। यह किसी राज्य,समूह या संगठन को सुव्यवस्थित ढंग से चलानें के लिए एक दस्तावेज होता है।यह लिखित या अलिखित दोनों रुपों में हो सकता है।
संविधान राष्ट्र का पवित्र दस्तावेज है। यह उन दर्शन या मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है;जिन पर कोई राष्ट्र विकसित होता है और उन लक्ष्यों की पहचान करता है जिस पर देश के नागरिकों की ऊर्जा को निर्देशित किया जाना चाहिए। यद्दपि यह दुखद है कि संविधान को जितना आदर और सम्मान मिलना चाहिए उतना नहीं मिल पाता है। संविधान को वकील और जैसे संभ्रात लोगों का दस्तावेज माना जाता है। इसे धार्मिक पुस्तकों(रामायण,भगवतगीता,कुरान,बाइबिल)की तरह हर घर में पढ़ा जाना चाहिए। इससे नागरिकों के अधिकार और कर्तव्य स्पष्ट रुप से समझ में आयेंगे।
हमारा संविधान शिक्षित करता है और जीवन जीनें के तरीके को बढ़ावा देता है। जो हर भारतीय के लिए जरुरी है।यदि हम इन आदर्शों का अनुसरण करते हैं, तो यह पूरे देश के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। संविधान की प्रस्तावना के अंतर्गत उन आदर्शों को आत्मसात किया गया है जिनके लिए हम प्रयास कर रहे हैं और इसके लिए एक मानसिक दृष्टिकोण आवश्यक है। प्रस्तावना जब हमें सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक न्याय,विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विश्वास तथा अवसर की समानता प्रदान करता है तो साथ ही नागरिकों के लिए आचार संहिता भी उपलब्ध कराता है। यदि हम प्रस्तावना के उद्देश्यों के प्रति अपनी मानसिक सोच को ध्यान में रखते हैं तो यह समाज के सभी वर्गों के लिए उपयोगी होगा। जब संविधान रोजगार में अवसर की समानता की बात करता है और जाति, धर्म,वंश,लिंग के आधार पर भेदभाव को रोकता है तो वह महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दे रहा होता है और यहां तक की जातिगत बंधनों को तोड़ रहा होता है। संविधान के प्रावधानों से भारतीय समाज के चेहरे को बदला जा सकता है। योग्यता के पनपनें का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। सर्वश्रेष्ठ को नेतृत्व के शीर्ष पदों पर जानें के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। संविधान की प्रस्तावना भारतीय संविधान को समाजवादी,और पंथ निरपेक्ष गणराज्य के रुप में स्थापित करनें के बारे में बात करती है। अन्नुछेद 21 में स्पष्टत: कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं रह सकता है यदि यही बात हमारे नागरिकों के दिमाग में शुरु से ही स्कूलों और घरों से ऐसी सोच हो ;तो ऐसी कोई बात नहीं होगी जिससे लोग कानून को अपनें हाथ में लें। 1976 में संसद द्वारा संविधान संशोधन के तहत एक नये अन्नुछेद 51ए को जोड़ा गया। यह नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों की बात करता है। ये कर्तव्य संविधान के प्रति सम्मान,समग्र,संस्कृति की समृध्द विरासत को संरक्षित करना,पर्यावरण में सुधार और सुरक्षा,हिंसा को रोकना एवं व्यक्तिगत और सामाजिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठता हासिल करना है। यदि सभी व्यक्ति अपनें कर्तव्यों का पालन करें तो यह सभी नागरिकों, सभी समुदायों,सभी सामाजिक और धार्मिक संगठनों और साथ ही साथ पूरे देश के लिए अच्छा कदम होगा। यह बेहतर जीवन और समावेशी विकास को सुनिश्चित करेगा। हालांकि यह तभी संभव होगा जब संविधान का प्रत्येक मौलिक व सामाजिक अन्नुछेद हमारे समाज के सभी वर्गों के लोगों विशेषकर युवावों के अंतःकरण में समाहित हो। संविधान को सजावटी टुकड़े के रुप में नहीं देखा जाना चाहिए,बल्कि इसे हर दिन पढ़ी जानें वाली पूजनीय और पवित्र पुस्तक के रुप में देखा जाना चाहिए।
सारांश-
अंततः यह कहा जा सकता है कि संविधान ही एक ऐसा माध्यम है जिसकी सहायता से हम सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक और मौलिक अधिकारों तथा कर्तव्यों को जान और समझकर अपनें और अपनें राष्ट्र के विकास में एक महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
"हमारा जो भी अधिकार है वो आपका कर्तव्य है"
MR.AKASH BIND
