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क्या आप दीपावली का सही अर्थ भी जानते हैं?दिपावली क्यों और कैसे मनायें?
धनतेरस कैसे मनायें?
क्या आप दीपावली का सही अर्थ भी जानते हैं?
राम के दर्शन होनें का क्या अर्थ है?
धनतेरस के दिन हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए?
क्या कहती हैं कहानियां और श्लोक आइए बारीकी से हमझते हैं।
राम नाम कड़वा लगे, मीठे लागे दाम।
दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम॥
पढ़कर कुछ याद आया?
दोहा तो सदियों पुराना है लेकिन हमारे उत्सवों की मौजूदा स्थिति को पूरी सटीकता से दर्शाता है।
दाम हमें मीठे लगते हैं, अख़बार, दुकान, सोशल मीडिया हर जगह से अपनी ओर ललचाते हैं। हर वर्ष जहाँ दफ़्तर, स्कूल या घर की व्यस्तता से कुछ समय मिलता है ‘राम’ के नाम पर वो भी ‘दाम’ के पीछे भागते हुए निकल जाता है।
जो ‘दाम’ पूरे साल आपका उद्धार नहीं कर पाया वो राम के दिनों में फिर एक बार आता है एक नया मुखौटा पहनकर।
अब राम के दिनों में भी उसके आकर्षण में फँसे रह जाएँगे तो दोनों हाथ से गँवाएँगे।
‘दाम’ अपनी ओर पूरी ज़ोर से आपको पुकार रहा है,
लेकिन आप राम को ही चुनना।
धनतेरस पर 'दाम' तो बहुत हुआ,
अब 'राम' को भी याद करें:
🪔 *राम के दर्शन होने का क्या अर्थ है?* 🪔
अपने जीवन में उन्हें प्रवेश दीजिए जो संसार को आपके लिए राममय बना दें। फिर संसार अकेले नहीं बदलेगा, आप भी संसार के साथ बदल जाओगे। दोनों बिल्कुल समानांतर चलते हैं – आप और संसार।
आँखें ऐसी हों जो राम को देखे बिना ही राम के स्वागत के लिए खुली हुई हों।
अगर ये शर्त रखोगे कि पहले राम मिलें तब उनमें विश्वास करूँगा, तो तुम्हें कभी नहीं मिलने के। और आँखें तो वही देखेंगी जो आँखें देख सकती हैं – पदार्थ, संसार, वस्तुएँ, व्यक्ति।
आँखें तत्पर हों कि जो दिखेगा उसी में राम को खोज लेंगे, तब तो राम के दर्शन होंगे अन्यथा तुम जीवन भर प्रतीक्षा करते रहो।
भारत भरा हुआ है कहानियों से, तुम्हें कभी हैरत नहीं होती?
चलते-फिरते लोगों को दर्शन हो जाते हैं। चित्रकूट में तुलसी को हनुमान मिल गए, तुमने कभी विचार नहीं किया? कभी गौर नहीं किया? ये क्या हो रहा है? और जानते हो हनुमान भी कैसे मिले थे? कहते हैं कि मनुष्य के भेष में एक प्रेत आया था, वो तुलसी को बता गया था कि हनुमान उधर मिलेंगे। चलते-फिरते प्रेत मिल रहे हैं? कैसे मिल रहे हैं?
ऐसे ही मिल रहे हैं – तुम्हारी तलाश इतनी गहरी है कि जैसे संसार मजबूर हो जा रहा है तुम्हें अपने पार का पता दे देने के लिए।
तुम इतनी शिद्दत से पूछ रहे हो कि दीवारें भी फुसफुसा दे रही हैं तुम्हारे कान में। तुम में है वो तीव्र वेदना? तुम में है वो सघन उत्कंठा कि मुझे जानना ही है, मुझे मिलना ही है? फिर कोई भी आ कर बता जाएगा कि कहाँ हैं हनुमान, फिर कोई भी आ कर बता जाएगा, फिर चलते-फिरते कोई मिलेगा।
देखते नहीं हो, भक्त के सामने कभी कोई प्रकट हो जाता है, कभी ब्राह्मण के भेष में ये आ गए, कभी किसी के वेश में आ गए, कभी किसी पशु के वेश में आ गए, कभी नदी बन के आ गए, कभी पहाड़ बन के आ गए, कभी रोगी बन के आ गए, कभी भिक्षु बन के आ गए, कभी किसी पेड़ पर चिड़िया बनकर बैठे हैं। और नीचे राजा को कुछ बता गयी चिड़िया चहचहा के।
वाकई लगता है तुम्हें चिड़िया का मंतव्य है बताने का? नहीं! चिड़िया के पास तो चिड़िया की ही बोली है, राजा के पास कान विशेष हैं। राजा ने सुन लिया है।
तुम सुनना शुरू करो, चहुदिश तुम्हें राम की ही आवाज़ सुनाई देगी।
लेकिन अगर तुम ये कहोगे कि पहले राम बोलें फिर मैं सुनूँगा, तो हो नहीं पाएगा। संसार ऐसे चलता है, अध्यात्म ऐसे नहीं चलता, सत्य ऐसे नहीं चलता। संसार में तुम कहते हो कि जब कोई बोलता है तब मुझे सुनाई देता है। अध्यात्म में कहा जाता है जब तुम सुनते हो तब वो बोलता है। बात सही भी है क्योंकि बोल तो वो सतत रहा है, तुम्हारे सुनने में खोट थी तो जब तुम सुनते हो तब वो बोलता है।
संसार में तुम कहते हो कि जब कोई आता है तो मुझे दिखाई देता है, अध्यात्म में ऐसा नहीं होता क्योंकि वहाँ कोई आने वाला है ही नहीं, वो तो चहुदिश व्याप्त है तो वो आएगा कहाँ से? तो वहाँ तो ऐसा होता है कि जब तुम देखते हो तब वो तुम्हें दिखाई देता है, उसके आने का कोई सवाल नहीं।
वो तो आया ही हुआ है, तुम देखो!